‘‘अधजल गगरी छलकत जाय’’अल्पज्ञान मुसीबतों का कारण

कुछ ज्ञानी विद्वानों ने बहुत अच्छी बातें कहीं है- ‘‘अधजल गगरी छलकत जाय,भरी गगरिया चुपके जाए’’ मतलब घड़ा आधा भरा हुआ हो,तो आवाज करता है, साथ में छलक कर गिर भी जाता है और पूरा भरा हो,तो बिल्कुल आवाज नहीं करता है और न ही छलकता है। पूर्ण रूप से भरा हुआ घड़े के पानी,पानी को पकड़े रहती है,उसी गिरने नहीं देती।

निष्कर्ष: गुणवान व्यक्ति सरल और गम्भीर रहते हैं। वे बोलने के बाद नहीं सोचते हैं बल्कि बोलने से पहले सोचते है। वे शांती से निर्णय लेते हैं।
पहाड़ों से,चट्टानों से गुजरती हुई नदी खूब आवाज करती है, क्योंकि वह छिछली होती है, गहराई नहीं होती है,कंकड़-पत्थरों से टकराते हुए, रास्ता बनाती हुई चलती है। वह नदी जब मैदान क्षेत्र में होती है तो दूर-दूर तक समतल भूमि होती है,तो नदी में हलचल नहीं होती, उसकी गति मंद हो जाती है। आवाज नहीं होती, लहरों का पता नहीं चलता। शोरगुल हमेशा उथलेपन का सबूत है।

यह बात मनुष्यों पर भी लागू होता है। ज्ञानी व्यक्ति हमेशा शांत स्वभाव के होते है, वे बड़बड़ाते नहीं रहते है अर्थात् वे व्यर्थ नहीं बोलते, तोल-मोल कर बोलते है। उससे बार-बार कुरेद कर पूछने पर भी उतना ही बोलेगा जितने की आवश्यकता है। ये गहन विद्या और एकाग्रता, साधना से प्राप्त होता है। दिखने में वह उदास दिखाई देगा क्योंकि उसमें व्यर्थ चंचलता नहीं होती। नदी में जैसी गहराई होती है। अंदर से गहरापन होता है, बाहर छिछलापन नहीं होता। उसे यह बताने की जरूरत नहीं होती है कि वह कितना विद्वान, कितना गुणी है, कितना भला, कितना परोपकारी है। उसके वाणी से स्पष्ट झलकता है। ऐसे व्यक्ति को किसी प्रणान-पत्र की जरूरत नहीं होती है, किसी प्रचार की जरूरत नहीं होती है। जो लोग अंदर से खोखले होते हैं, वे अपने मुंह मिया मिठू बनते है। उनके लिए यह जरूरी भी है, जिनका प्रचार दुसरे नहीं करते, उन्हें स्वयं का प्रचार खुद करना पड़ता है। ऐसे लोग ज्यादा छिलकते रहते है, अपना गीत स्वयं गाते रहते हैं। अब नेता लोग को ही लेलो, हमेशा बढ़ा-चढ़ा कर बोलना उनकी आदत है, थोड़ा सा कंबल बाँट दिया उसका गीत महीनों सालों तक चर्चा करते रहते है। समाज में कुछ ऐसे समाजसेवी भी है, जो भविष्य में नेता बनने के लिए नये-नये भाषण,वादा कर डालते है और कहते है कि आपका हक मै दिलवाकर रहूँगा, मेरे बहुत ऊपर तक पहचान है और जब वादा, विश्वास टुट जाता है तब कहते है कि चुनाव आ गया, विपक्षा होने नहीं दे रहा है और फिर बोलते है कि हमें सत्ता में आने दिजिये फिर आपको काम मै चुटकियों में कर दूंगा और एक बार जीत गये तो हम आपके है कौन ? अर्थात् बढ़ा-चढ़ा कर बोलते रहना ही अल्पज्ञान का पहचान है। ऐसे लोग अपना तो क्षय करते ही हैं साथ में उससे उम्मीद लगाये दुसरा आदमी को भी मुँह की खानी पड़ जाती है अर्थात् बिना मतलब का कठिनाइयों का सामना करना पर जाता हैं। इसलिए उतना ही ज्ञान बाँटे जितना आपमें हैं और ये आपके लिए भी अच्छा है और दुसरे के लिए भी है।

One thought on “‘‘अधजल गगरी छलकत जाय’’अल्पज्ञान मुसीबतों का कारण

  • मई 14, 2019 at 8:16 पूर्वाह्न
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    badiya jankari share kee apne thanks

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