अपने माता-पिता तथा अपने मातृभूमि को भूलकर विदेशों में बसता युवा पीढ़ी

आज जिस प्रकार से अपनी मिट्टी से लोगों का नाम टूटता जा रहा है, वह अत्यन्त ही दयनीय है। लोग अपनी मिट्टी को छोड़कर सिर्फ पैसों की खातिर देश तथा अन्य राज्यों से विदेशों में जाकर बसने का सपना ही नहीं देखते बल्कि वहाँ जाकर बस भी रहें है। यह ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार माता-पिता अपने बच्चों को जन्म देते हैं, पालन पोषण करते हैं, पढ़ाते-लिखाते है, बिमार पड़ने पर दवा एवं सेवा करकेे उसे ठीक करते हैं, फिर वही बच्चे जब अपने पैरों पर खड़े हो जाते हैं, तो अपने बूढ़े माता-पिता को तिरस्कार कर खाना-पीना बन्द कर देते हैं और उसके बाद उन्हें घर से बाहर भी निकाल देते हैं।

यह सब ठीक उसी प्रकार होता है, जिस प्रकार बच्चे बड़े होकर अपनी माँ-बाप का छोड़कर एक राज्य से दूसरे राज्य और अपने देश से दूसरे देशों में चले जाते हैं क्योंकि वहाँ पैसा आसानी से आ जाती हैं। अगर यही अपने बिहार या अपने राज्य में ही रहकर अपनी भारत माता की सेवा किया जाए तो क्या हर्ज है। आज स्थिति ऐसी है कि अगर पुत्र अपने माता-पिता का एकमात्र पुत्र है तो वह भी बड़ा होकर विदेशों में जाकर नौकरी करते हैं, जिसमें उनके पिता भी जिम्मेदार होते हैं। माता-पिता को लगता है कि उनका पुत्र विदेशों में जाकर खूब पैसा कमा लायेगा और अपने माँ-पिता की भरपुर सेवा करेगा। यह अभिलाषा ही माता-पिता को अपने पुत्र से दूर कर देता है, क्योंकि विदेशों में जाकर उसका पुत्र अपने परिवार यानि पत्नी,बेटे और बेटी में ही मगन हो जाता हैं। उसे अपने माता-पिता का ख्याल ही नहीं रहता है कि उसका वृद्ध माता-पिता अपने पुत्र की राह देख रहा होगा। आखिर अन्त में ऐसा समय आता है जब माता-पिता की साँस की डोर टूट जाती है। पुत्र को खबर जाती है। पुत्र आकर अपने माता-पिता का अन्तिम संस्कार करता है और फिर अपने देश भारत माता को छोड़कर घर को दूसरे के हवाले कर विदेश में अपनी पत्नी,बेटे और बेटी पास चला जाता हैं।

ऐसे पैसा किस काम का जिसे उसके माता-पिता के काम न आ सके। ऐसे पैसा किस काम का जो अपने बूढ़े माता-पिता का अन्तिम समय में काम न आए। ऐसा विदेश में बसना किस काम का कि उस पुत्र का पुत्र भी अपनी दादा-दादी के भी काम न आए।
आज लोग अपने बिहार की माटी को भूलकर दूसरे राज्य में चले जाते हैं-क्यों? क्योंकि अपने अंहकार के कारण। अपने घर से कमाने में उन्हें घृणा होती है-उन्हें भय होता है कि लोग क्या कहेंगें। अपना काम करने में कोई घृणा नहीं कोई भय नहीं। बल्कि जिस तरह माँ अपने बच्चों को पालती है ठीक उसी तरह ही अपने बिहार की मिट्टी से प्रेम होना चाहिए तथा बाहर जाकर काम करने की ईच्छा को त्याग कर अपनी मिट्टी से करना चाहिए। ऐसा जिस दिन से होना शुरू हो जायेगा, लोग अपने घर में रहकर ही अपनी मिट्टी की सेवा करेंगें। तो वह दिन दूर नहीं जब यहाँ की मिट्टी खूशबू विखेरेगी और यहाँ के किसान,व्यापारी सब अपने मिट्टी से ठीक उसी प्रकार प्रेम करने लगेगें जिस प्रकार एक माता-पिता अपने बच्चों से प्रेम करते हैं।

One thought on “अपने माता-पिता तथा अपने मातृभूमि को भूलकर विदेशों में बसता युवा पीढ़ी

  • सितम्बर 8, 2018 at 12:20 अपराह्न
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    Very true

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