आत्मा क्या है तथा आत्मा का स्वरूप क्या है-atma kya hai

आत्मा के स्वरूप जानने से पूर्व ये जान लें कि समस्त वेद (ऋग्वेद,यजुर्वेद,सामवेद और अथर्ववेद) जिसका प्रतिपादन करते हैं,वह है ‘ऊँ’। वह परात्पर परमात्मा जो सब नामों से परे होने पर भी सब नामों से भरा हुआ है, जो सर्वथा नामविहीन होते हुए भी अनेक नामों से सम्बोधित किया जाता है, उसके समस्त नामों में ‘ऊँ’ सर्वश्रेष्ठ है। ‘ऊँ’ शब्द ब्रह्म का प्रतीक है। यह अक्षर ही ब्रह्म है और इसी अक्षर को ब्रह्मस्वरूप समझकर इसकी उपासना करने से साधक जो चाहता है, वह प्राप्त करता है। यह ओंकार ही ब्रह्म की प्राप्ति का सबसे उत्तम और श्रेष्ठ आश्रय है।

यह आत्मा न जन्म लेता है, न मरता है। न यह किसी दूसरे से उत्पन्न हुआ है, न कोई दूसरा ही इससे उत्पन्न हुआ है। यह अजन्मा हैै। शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मरती। अर्थात् मरना और मारना सब शरीर में है। आत्मा न कभी मरती है और न ही उसे कोई मार सकता है। किसी भी शस्त्र से शरीर कट जाने पर भी यह आत्मा ज्यों की त्यों बनी रहती है। जिस प्रकार कोई मकान नष्ट हो जाने पर, उसमें स्थित आकाश नष्ट नहीं होता, उसी प्रकार शरीर आदि के नष्ट होने से उसमें स्थित आत्मा का नाश नहीं होता। मारने वाला समझता है कि ‘मैं इसे मारता हूँ’ और मरने वाला समझता है ‘मैं मरा हूँ’ परन्तु ये दोनों ही अज्ञानी हैं क्योंकि यह आत्मा न तो किसी को मारता है और न कोई मरता ही है।

आत्मा सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर है और महान से भी महत्तर है। यह जीव की हृदय-गुफा में छिपी हुई है। इस आत्मा को वही देख सकता है जो सभी कामनाओं से रहित है, जो पुत्र,पत्नी व धन की उत्पत्ति या विनाश की एक अनन्त सत्त को प्राप्त करता हुआ शान्त और स्थिर रहता है। किन्तु जो इस प्रकार का नहीं है, उसे आत्मा के दर्शन नहीं होते, क्योंकि यह आत्मा निश्चल होने पर भी दूर तक पहुँच जाती है, सोई हुई ही सर्वत्र चली जाती है। यह विद्या और धन इत्यादि अहंकार से युक्त होते हुए भी अहंकार से परे या रहित है।

यह आत्मा नाशवान शरीर में रहते हुए भी शरीर से अलग है। समस्त अस्थिर पदार्थों में व्याप्त होते हुए भी सदा स्थिर है। जो ज्ञानी पुरूष इस सूक्ष्म रूपी आत्मा को जान लेता है वही शोक से तर जाता है। आत्मा सबमें व्याप्त होने पर भी न तो वेद के प्रवचन से प्राप्त होती है, न विशालबुद्धि से मिलती है और न केवल जन्म भर शास्त्रों के सुनने से ही मिलती है। यह उसी को मिलती है, जो इसको पाने के लिए परम व्याकुल रहते हैं अर्थात यह स्वयं प्रकाशित होने वाली आत्मा स्वयं ही स्वीकार कर लेती है और जिसके निकट अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट कर देती है।

आत्मा और परमात्मा का एक अर्थ यह है कि जो यजमान को दुःखसागर से पार करने के लिए पुल के समान है, वही नाचिकेत अग्नि है और जो संसार-सागर से पार होने की इच्छा रखने वालों के लिए परम आश्रयस्वरूप है, वही ‘अक्षर’ परब्रह्म है। कर्म और ज्ञान के द्वारा ही परब्रह्म को जानना चाहिए। जीवों की मुक्ति के लिए जितने रास्ते हैं, उन सब में ज्ञान ही प्रधान है। आत्मा का एक रूप से और वर्णन कर सकते हैं जैसे- शरीर रथ है, आत्मा रथ का स्वामी अर्थात रथी है, बुद्धि सारथि है और मन लगाम है। श्रोत्रादि इन्द्रियाँ घोड़े है, शब्द, स्पर्श इत्यादि विषय ही घोड़ों के दौड़ने का मैदान है और शरीर, इन्द्रिय तथा मन से युक्त आत्मा को ‘भोक्ता’ कहते हैं। जिसकी बुद्धि में विवेक होता है, जिसका मन एकाग्र और समाहित होता है, उसकी इन्द्रियाँ अच्छे घोड़ों की तरह बुद्धिरूप सारथि के वश में रहती है। जिसका मन चंचल है, जो अज्ञानी है और जो सदा बूरे काम करता है, ऐसे को कभी अपने लक्ष्य परमपद ब्रह्म की प्राप्ति नहीं होती। उसे बार-बार कष्टमय जीवन अर्थात जन्म-मरण के चक्र में उसे भटकना पड़ता है। किन्तु जो ज्ञानी हैं, जिसका मन निगृहीत है, जो सदा पवित्र रहता है, वह ऐसे परमपद को पाता है जहाँ से लौटकर फिर जन्म नहीं लेना पड़ता। जिसका बुद्धिरूप सारथि विवेकी है, जिसकी मनरूप लगाम स्थिर है, जिसके इन्द्रियरूपी घोड़े लगाम के साथ विवेकमयी बुद्धि के वश में है, वह इसी रथ की सहायता से संसार-सागर के उस पार अपने लक्ष्य स्थान पर अनायास ही जा पहुँचता है और वही विष्णु का पार्षद होता है।

इस प्रकार भी आत्मा को समझ सकते हैं-‘इन्द्रियों से उनके विषय श्रेष्ठ हैं, विषयों से मन श्रेष्ठ है, मन से बुद्धि श्रेष्ठ है और बुद्धि से महत् श्रेष्ठ है। महत् से अव्यक्त श्रेष्ठ है और अव्यक्त से पुरूष श्रेष्ठ है। बस! बस इस पुरूष से परे और कोई नहीं है। यही चरम सीमा है, परम गति है, किन्तु यह केवल ज्ञानियों के द्वारा सूक्ष्म वस्तु के निरूपण में निपुण एकाग्रता-बुद्धि से ही देखा जा सकता है। बुद्धिमान लोग इस मार्ग को तलवार की धार पर चलने के समान मानते हैं। इन्द्रियाँ बर्हिमुखी है, इसी से वे केवल बाहर की वस्तुओं को देखती हैं, अन्तरात्मा को नहीं देखतीं। कोई विवेक से सम्पन्न पुरूष ही अमृतत्त्व की शुभ इच्छा से इन इन्द्रियों को अन्तर्मुखी करके अन्तरात्मा को देख पाता है। अज्ञानी लोग बाह्य विषयों की ओर ही दौड़ते हैं और इसकी से वे सर्वत्र व्याप्त मृत्यु के फन्दे में फँस जाते हैं, परन्तु ज्ञानी पुरूष उस अमृतत्त्व को जानकर इस नाशवान पदार्थों का कामना नहीं करते। जो अज्ञान के प्रभाव से उस अभिन्नस्वरूप ब्रह्म को अनेक रूपों में देखता है, वह बार-बार मृत्यु अर्थात जन्म और मृत्यु के चक्र में ही फँसा रहता है। इस ज्ञान की प्राप्ति केवल विचार से हो सकती है। यहाँ तनिक भी संदेह नहीं है। जिसको यहाँ संदेह दिखाई देता है उसे ही बार-बार मृत्यु की शरण लेनी पड़ती है। जिस प्रकार शुद्ध जल में अशुद्ध जल मिलाने पर दोनों मिल कर एकरस-तन्मय हो जाते हैं, इसी प्रकार आत्मदर्शी पुरूष की आत्मा, परमात्मा से मिलकर ब्रह्मरूप बन जाती है।

बहुत लोगों का यह प्रश्न होता है कि मृत्यु के बाद जीव का क्या होता है तो इसे इस प्रकार समझा जा सकता है कि जिसके जैसे कर्म होते हैं और जिसकी जैसी इच्छा होती है, जिसका जैसा ज्ञान होता है, उसी के अनुसार कोई तो मृत्यु के बाद माता के गर्भ में जाता है और कोई मृत्यु के पश्चात् वृक्ष,पाषाण आदि स्थावर योनि को प्राप्त होता है। जब समस्त प्राणी निद्राग्रस्त रहते हैं, तब जो एक निर्गुण ज्योतिर्मय ब्रह्म सुप्रकाशित रूप से जाग्रित रहकर समस्त विषयों को प्रकाशित करता है, वही शुद्ध है, वही ब्रह्म है, उसके अतिरिक्त और कोई छिपा हुआ ब्रह्म नहीं है। पृथ्वी इत्यादि सभी लोक उसी में स्थित हैं, उसका क्षय कोई भी नहीं कर सकता।

अग्नि एक ही है, परन्तु जैसे सम्पूर्ण भुवन में प्रवेश करने पर वही भिन्न-भिन्न वस्तुओं में दीखता है, इसी प्रकार समस्त प्राणियों में रहने वाली आत्मा एक ही है, परन्तु सबमें भिन्न-भिन्न रूप् में दीखती है। आकाश की तरह निर्विकार होने के कारण बाहर भी वही रहती है। जैसे एक ही वायु लोक में प्रवेश कर भिन्न-भिन्न रूप में दिखती है तथा बाहर भी रहती है। अग्नि और वायु के दृष्टान्त में केवल यही अन्तर है कि अग्नि तो प्रकाश का स्वरूप होकर लोक में प्रवेश करता है और वायु प्राणस्वरूप होकर प्रत्येक शरीर में प्रवेश करता है। जैसे एक ही सूर्य सब लोकों की आँख है, अच्छी-बुरी सभी वस्तुओं का प्रकाश सूर्य से होता है तथापि वह बाहरी दोषों से लिप्त नहीं होता। इसी प्रकार वह आत्मा सर्वव्यापी होने पर भी जगत् के दुःखों से लिप्त नहीं होती, उनसे बाहर रहती है। समस्त भूत-प्राणियों के अन्दर शक्तिरूप् से रहने वाली आत्मा एक ही है। वही सबकी नियन्ता है, वह एक ही अनेक रूपों में दिखाई देती है। जो धैर्यवान पुरूष इस प्रकार आत्मा को जानते हैं, उनको ही नित्यसुख प्राप्त होता है, किसी और को नहीं। जो एक ही अनेकों की कामनाओं को पूर्ण करता है, जिसको उस आत्मा का अनुभव होता है, वे ही नित्य शान्ति को प्राप्त होते हैं। जिसको सूर्य प्रकाशित नहीं कर सकता, जो चन्द्रमा और तारागणों से प्रकाशित नहीं होता, बिजली जिसे प्रकाशित नहीं कर सकती, उसको अग्नि क्या प्रकाशित करेगा? जिसके प्रकाश से ही सबका प्रकाश होता है, उसी परिपूर्ण प्रकाश की दिव्यज्योति से समस्त विश्व प्रकाशित हो रहा है। इस दृश्यमान् संसार के समस्त पदार्थ उस परब्रह्म से निकलकर उसी की सत्ता से सदा काँपते हुए अपने-अपने काम में लगे रहते हैं क्योंकि वह उठे हुए वज्र के समान महाभयंकर है। अग्नि इसी के भय से तपता है, सूर्य इसी के भय से तपता है तथा इन्द्र, वायु और पंचम मृत्यु इसी के भय से दौड़ते हैं। जो पुरूष इस शरीर के नाश हाने से पूर्व ही उस आत्मा को जान लेता है, वही मुक्ति पाता है, नहीं तो, इस जन्म-जन्मांतर अर्थात जन्म-मृत्यु के चक्र में फँसा रहता है।

जब मनुष्य की सारी कामनायें नष्ट हो जाती है और जब मन सब प्रकार की मलिनता को त्यागकर अत्यंत विशुद्ध बन जाता है और तब अन्तःकरण की समस्त कामनाएँ सम्पूर्ण रूप् से नष्ट हो जाती है, तब यह मरणशील मनुष्य अमृत बनकर यहीं परब्रह्म को प्राप्त करके ब्रह्मानन्द में मग्न हो जाता है। उसके हृदय में मैं और मेरे की समस्त ग्रन्थियाँ नष्ट हो जाती हैं और वह अमृत बन जाता है।

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