आयुर्वेद क्या है और इसके आठ प्रमुख अंग कौन-कौन से हैं?

जिस शास्त्र में आयु, अहित आयु, सुख आयु तथा दुःख आयु का वर्णन हो एवं आयु के हित – अहित के लिए उचित आहार एवं औषधि का वर्णन हो उसे आयुर्वेद (शास्त्र ) कहा जाता है। अथर्ववेद का ही उपवेद यह आयुर्वेद है, जो आयु की रक्षा के ज्ञान को संयोगे रखता है।

आयु की कामना करने वाले व्यक्ति को आयुर्वेद का अध्ययन करना चाहिए एवं आयुर्वेदशास्त्रों में निर्दिष्ट उपदेशों का पालन करना चाहिए। आयुर्वेद शब्द ‘आयु’ से बना हुआ है अतः इसमें आयु को बढ़ाने वाली हर एक उचित बात लिखी हुई है। आयुर्वेद भारत द्वारा विश्व को दिया गया सबसे महत्वपूर्ण देन हैं। होमिओपैथी चिकित्सा आयुर्वेद से ही ली गयी है।

रोग या रोगों की शांति के लिए चिकित्सक द्वारा जो-जो उपाय किये जाते हैं उन सबका सम्मिलित नाम चिकित्सा है। आयुर्वेद को मुख्यतः आठ भागो में विभाजित किया गया है:

  1. काय चिकित्सा – इसमें सम्पूर्ण शरीर को पीड़ित करने वाले अमाशय एवं पक्वाशय से उत्पन्न होने वाले ज्वर आदि समस्त रोगों की शांति का उपाय किया जाता है। इसे काय चिकित्सा नामक प्रथम अंग कहते हैं। यह ‘काय'(शरीर) यौवन आदि अवस्थाओं वाला है।
  2. बालतन्त्र या कौमारभृत्य – बालकों के शरीर में परिपूर्ण बल तथा धातुओं आदि का आभाव होने के कारण इस अंग का सम्पूर्ण वर्णन किया गया है।
  3. गृह चिकित्सा – इसमें देव, असुर, पूतना आदि ग्रहों से पीड़ित प्राणियों के लिए शांतिकर्म की व्यवस्था की जाती है।
  4. ऊर्ध्वान्ग चिकित्सा(शालाक्य तंत्र) – उर्ध्वजत्रुगत  आँख, मुख, कान, नासिका आदि में आधारित रोगों की शलाका आदि द्वारा की जानी वाली चिकत्सा ही इस अंग का प्रधान क्षेत्र है।
  5. शल्यतंत्र – आयुर्वेद के आठ अंगों में यह सबसे प्रधान अंग है क्योंकि प्रथम देवासुर-संग्राम में युद्ध में हुए घावों को ठीक करने के लिए इसकी आवश्यकता पड़ी थी। उस समय देववैद्य अश्विनी-कुमारों ने इस तंत्र का समुचित प्रयोग कर दिखाया था। मूलतः इस तंत्र में यन्त्र, शस्त्र, क्षार, अग्नि के प्रयोगों का निर्देश मिलता है।
  6. दंष्ट्राविष चिक्तिसा (अगदतंत्र ) – इसमें सर्प आदि तथा वात्स्नाभ आदि स्थावर विषों के लक्षणों का एवं विविध प्रकार के मिश्रित विषों (गरविषों) का वर्णन तथा उनके शांति के उपायों का वर्णन किया गया है।
  7. जराचिकित्सा (रसायनतंत्र) – उक्त अगदतंत्र के बाद रसायनतंत्र के प्रस्तुतीकरण का औचित्य प्रतिपादित करते हुए श्री अरुणदत्त कहते हैं कि रसायनों के प्रयोग से विष का भी प्रभाव दूर हो जाता है। रसायनतंत्र उसे कहा गया है जो वयः स्थापन (कुछ समय के लिए पुनः यौवन को स्थिर करना ) में  सहायक होता है, आयु को बढ़ाता है, मेधा अर्थात धारणा शक्ति तथा सभी प्रकार के बल को बढ़ाने एवं रोगों का विनाश करने में समर्थ हो।
  8. वृषचिकित्सा (वाजीकरणतंत्र) – वाजीकरणतंत्र उसे कहते हैं जो अल्प मात्रा वाले शुक्र का संतर्पण करता है, दूषित शुक्र को शुद्ध करता है, क्षीण शुक्र को बढ़ाता है और सूखे हुए शुक्र के उत्पादन के उपायों का निर्देश करता है। लिंग में प्रहर्षता को उत्पन्न कर नर-नारी में सन्तानोत्पादन शक्ति को बढ़ाता है।

सावधान – ‘रसायन’ एवं ‘वाजीकरण’ का उपयोग केवल स्वास्थ्यवर्धन एवं प्रजोत्पादन के लिए ही होना चाहिए, दुराचार या दुष्प्रवृति के लिए कभी भी इनका प्रयोग न करें, ऐसा करने से हानि भी हो सकती है। साथ  ही इनका प्रयोग योग्य चिकित्सक की देख-रेख में ही करना चाहिए। इनके सेवन में जितेन्द्रिय होना अति आवश्यक है, तभी इनका पूरा लाभ मिलता है।

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