इज्जत का सवाल

एक मुल्ला जी थे. एक रात वह अपने गाँव से दुसरे गाँव जा रहे थे. अचानक उन पर चार चोर टूट पड़े, मुल्ला जी ने भी बड़ी वीरता से चोरों का मुकाबला किया. उन्होंने इतने जोर से जवाबी वार किये कि यदि चोर चार ना होते तो अकेले उस मुल्ला जी के सामने टिक ना पाते. देखते-देखते वे चारों चोर आक्रमण की वजाय सुरक्षा की मुद्रा में आ गये. वे चार थे इस कारण आख़िरकार जब मुल्ला जी थक गये, तब उन्होंने उन पर काबू पा लिया.

काफी उत्साह से उन चोरों ने मुल्ला जी की जेब टटोलनी शुरु की. मुल्ला ने जिस वीरता से उनका मुकाबला किया था, उससे चोरों ने यही समझा था कि जरुर इसके पास तगड़ा माल है. लेकिन चोर उस समय ठगे से रह गये , जब मुल्ला जी की पूरी तलाशी में भी उन्होंने मुश्किल से दो चार सिक्के ही हासिल किये. सोना नहीं, चाँदी नहीं, कोई हीरे मोती नहीं, कौड़ियो के मोल केवल दो चार सिक्के. एक चोर से ना रहा गया. उसने मुल्ला जी से पुछ ही लिया, ‘हद हो गयी इतनी मामूली रकम बचाने के लिए तुमने इतने जोर शोर से मुकाबला किया. यदि तुम्हारे जेब में एकाध अशर्फी भी होती, तब तो जरुर तुम हम चारों को मार डालते. क्यों? मुल्ला जी ने जवाब दिया, ‘सवाल रूपये पैसे का नहीं है. मैं अपनी गरीबी अजनबियों के सामने जाहिर नहीं होने देना चाहता था. मेरी जेब में क्या है, क्या नहीं, यह मेरा रहस्य था. किसी के सामने मैं इस रहस्य को क्यों खोलता? इज्जत की खातिर मैं अपनी जान भी दे सकता हूँ.

चारों चोर स्तब्ध रह गये और मुल्ला जी को सुरक्षित उनके गाँव तक छोड़ गये.

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