एल्युमीनियम बर्तनों के उपयोग से बढ़ती है बिमारियाँ

स्वर्गीय राजीव दीक्षितजी की सलाह-

मैंने कुछ वर्षो से काम करते-करते इन सुत्रों को किताब में लिख डाली हैं। वाग्भट जी का जो अष्टांग हृदयं, अष्टांग संग्रह के इनके सुत्रों को कलेक्ट करके एक पुस्तक बनाई है- पार्ट-1, पार्ट-2, पार्ट-3 तीन पुस्तक है। मूल लेखक वाग्भटजी है, मैंने सिर्फ सेलेक्ट किया है और साथ में आज के हिसाब से उसको विश्लेषित किया है। जैसे- मैं एक उदाहरण दूँ तो आपको यह बात समझ में आ जाएगा। एक सूत्र में उन्होंने लिखा कि भोजन बनाते समय पवन का स्पर्श और सूर्य का प्रकाश अगर नहीं मिला किसको ? भोजन को। वो भोजन कभी नहीं करना क्योंकि ये भोजन जहर है, कहना यह चाहता हूँ। अब तक जो बोला वो वाग्भट जी का हिस्सा था। अब जो बोल रहा हूँ वो मेरा हिस्सा है। वाग्भट जी कह रहे हैं कि प्रेशर-कुकर में कभी भोजन नहीं बनाना चाहिए। प्रेशर-कुकर एक ऐसा तकनीक है, जिसमें भोजन बनाते समय न तो सूर्य का प्रकाश जा सकता है और न ही पवन स्पर्श मिलेगा।

फिर मैंने वैज्ञानिकों से बात कि प्रेशर कूकर में पकाया भोजन जहर है क्या? ऐसा वाग्भट जी का कहना है तो आपका क्या कहना है। हमारे देश में सी0डी0आर0आई0 के नाम से एक बड़ी रसायन प्रयोगशाला है। वहाँ के वैज्ञानिक रिसर्च करके के बताया कि बात तो सच ही है, वाग्भट जी का। मैंने बोला ये टी0वी0 पर बोल सकते हैं तो उन्होंने कहा कि कूकर कंपनियाँ गर्दन काट देगी। तुम चाहो तो बोलो। मैंने कहा आपकी रिसर्च क्या कहती है तो वे बोले कि ये जो पेशर-कूकर है ज्यादा-से-ज्यादा या ये एल्युमीनियम के बने हुए है और वे कहते है भोजन रखने और बनाने का सबसे खराब धातु है वो एल्युमीनियम ही है। 18 साल का रिसर्च यह कहता है कि अगर एल्युमीनियम पेशर-कुकर का खाना बार-बार खाते जाओ तो गारन्टी है कि आपको मधुमेह, अस्थमा और सबसे ज्यादा टी0वी0 होने के संभावना है। उन्होंने कहा मैंने 48 बिमारियाँ को शोध किया है जो प्रेशर-कूकर में खाने से ही होते हैं। सब का जीवन कम होता है और शक्ति भी कम होती है, रोग सबसे ज्यादा उन्हें आता है। मैंने तय किया है ये एल्युमीनियम सबसे पहले कब और कहाँ से आया यह पता लगाओ तो मुझे पता चला कि ये सौ-सवा सौ पहले आया। ये अंग्रेजों के सरकार का यह पहला संदेश आया, वो ये कि एल्युमीनियम के बर्तन बनाने का, वो जेल के कैदियों के लिए आया क्योंकि ये सभी भारतीये क्रांतिकारी थे और अंगेजों को इसे मारना था। इनको सोच-विचार कर के ही एल्युमीनियम के बर्तन में खाना देना है ताकि ये जल्दी मरे या मरने की स्थिती मे आ जाए। परिणाम क्या हुआ अंग्रेज तो चले गये लेकिन आज भी जेलों में इसी धातु का उपयोग किया जाता है अब मुश्किल ये आ गया कि जेलों से हमारी घरों में आ गया और खासकर गरीबों के घरों में।

मैंने उदाहरण से समझा दिया कि प्रेशर-कूकर में खाना खाने के क्या परिणाम हैं। दो और चीज है अपने घरों में रेफ्रिजरेटर और माइक्रोवेव इसमे भी सूर्य का प्रकाश नहीं जा सकता है, पवन का स्पर्श नहीं हो सकता है। मतलब सीधा है कि जो भी आधुनिक तकनीक से बनी हुई चीज जो हमारे घरों में आएं हैं वो जहर है जो धीर-धीरे हमें खा रहा है। प्रेशर-कुकर एक ऐसी तकनीक है जो हमारे खाने को जल्दी पकाती है ये है सीधा सा मतलब। प्रेशर-कुकर क्या करता है जो आपने आनाज पकने के लिए उसमें डाले हैं उसपर जो आपने पानी डाला है ये अतिरिक्त दबाव डालता है ये प्रेशर मतलब दबाव और ये अतिरिक्त दवाब कहाँ से आती है, प्रेशर-कुकर में आपने दाल डाली उपर से पानी डाली और बंद कर दिया और फिर एक सीटी लगा दी। वो सीटी लगाई यही सबसे खतरनाक बात है। सीटी लगते ही वो क्या करता है, नीचे से गरम और ऊपर से वाष्प का दवाब किसपर दाल पर,चावल,सब्जी पर ये दवाब डालकर होता क्या है एक दाल को तोड़कर दो टुकड़े जिसको द्विदल कहते हैं तो ये दाल फट जाती है वो दरक जाती है पानी इतना गर्म होता है वो उबल जाती है, पकती नहीं है। पकना और उबलना में अंतर है वो उबल गई है और मुलायम भी हो गई है मगर पकी नहीं है। पकी हुई दाल का आयुर्वेद में एक सिद्धांत है कि जिस वस्तु को खेत में पकने में जितना समय लगता है भोजन रूप में उतना ही पकनें में लगता है। तो आप जानते हैं कि खेत में अरहड़ की दाल को खेत में पकने में कितना समय लगता है, कम-से-कम 7 से 8 महीने लगता है क्यों? अरहड़ में जो भी प्रोटीन, विटामिन है और जो खेत की मिट्टी में जो कैल्शियम, सिलिकॉन, आयरन आदि ये सब सूक्ष्म पोषक तत्व है ये पौधे के जड़ में आते हैं फिर तने से फल में आते हैं इस पुरे क्रिया में बहुत समय लगता है तो इसलिए दाल को पकने में समय लगता है। आप दाल क्यों खाना चाहते हैं आप दाल खाना चाहते हैं, प्रोटीन के लिए, प्रोटीन कहाँ से आएगा? ये जो सूक्ष्म पोषक तत्व के टूट जाने पर,बिखर जाने पर जो समय लगेगा उसी से प्रोटीन आएगा। प्रकृति का ये नियम है कि जो चीज बनने में समय लगी है उसे गलने में भी समय लगेगा और दाल जब गलेगी तब आपको उसमें प्रोटीन मिलेगी भोजन में। इसलिए आप दाल खा रहे हैं ताकि आपको पोषक तत्व मिले। आयुर्वेद का बिल्कुल सीधा नियम है कि अनाज अगर देरी से पकी है तो घर में भी भोजन देर से ही पकेगी।

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