गंगा नदी

ईश्वर का दिया हुआ प्रचीन धरोहर गंगा नदी जो गायत्री मंत्र की तरह पवित्र और पावन है। ऐसा जल जिसमें किड़ा, जीवाणु का थोड़ा अंश भी न रहे, जो सडे़ नहीं, बदबू न दे, वो है हमारी गंगा नदी। जल कितना भी पुराना हो उसमें किसी तरह की गंदगी नहीं होता है। गंगा नदी, जिसमें स्नान करने पर सारा शरीर निर्मल हो जाता है, जिसका जल सभी नदियों से मीठा और पावन है। जिसमें किसी तरह का अनाज सबसे जल्दी पकता हो, वो है हमारी गंगा नदी, जिसे हम गंगा माता के नाम से भी जानते हैं। ऐसा जल जो सभी पूजा विधि में उपयोग में लाया लाया जाता है, जैसे- छठ पूजा, दिपावली, दशहरा, सत्यनारायण भगवान की पूजा, अनंत पूजा इत्यादि।

महाराज भगीरथ के सचमुच हम बड़े आभारी हैं कि उन्होंने अपनी असाधारण साधना से गंगा को पृथ्वी पर लाने में सफल हुए। कहा जाता है कि गंगा संसार के पालक विष्णु भगवान के पदनखों से जनमी, ब्रह्या ने इस चरणामृत को अपने कमंडलु में धारण किया। भगीरथ की तपस्या के कारण जब महाराज सगर के साठ हजार अभिशप्त पुत्रों के उद्धार के लिए गंगा प्रबल वेग से आकाश से उतरी, शिव ने उसे जटावान मस्तक पर धारण किया। गंगाधर के जटाजूट में अनेक वर्षो तक चक्कर काटने के बाद ज्येष्ठ मास में शुक्लपक्ष की दशमी तिथि को यह पृथ्वी पर आई। मार्ग में उसनें जह्नु ऋषि के यज्ञमंडप को ही बहा दिया। क्रोध में मुनि भागीरथी को चुल्लुओं में पी गए, तो बड़ा हाहाकार मचा। लोगों की प्राथना पर जह्नु ने उसे अपने कान के मार्ग से बाहर किया। इसलिए वह ‘जह्नूतनया’ तथा ‘जाह्नवी’ कहलाई। वहाँ से गंगा आगे गई और रसातल पहुँचकर भगीरथ के पुर्वजों के भस्म को अपने पवित्र जल से बहाकर स्वर्गलोक तक ले गई।

इस पावनी गंगा ने जितने महान कार्य किए, अनन्त है। वह शिव के तेज को शांत कर स्कंद के जन्मग्रहण में सहायिका बनी। गंगा ने कितने दलितों-पतितों का उद्धार किया है-  यह किसे मालूम नहीं है? गंगा यदि कुछ नहीं करती, तो केवल उसका भीष्मजननी होना क्या साधारण बात है? भारतवर्ष के सुदीर्घ इतिहास में जो दो-चार वीरव्रती ब्रह्यचारी हुए हैं, जिसमें भीष्म का नाम सर्वोपरि है। इसका सारा श्रेय सिर्फ माता गंगा को है।

किन्तु, आज हमारी यह गंगा इतनी मैली हो चुकी कि इसे ग्रहण करन तो दूर अब नहाने में भी संकोच होती है। हम अपने स्वार्थ के कारण उसे गंदा करते जा रहे है, आज किसी शहर से अगर गंगा नदि गुजरती है, तो हमलोग लगभग 50-60 गंदे नालें का दुषित पानी जरूर गंगा में प्रवाहित करते है। इसमें कल-कारखानों का भी बहुत योगदान है, आज के समय में पलास्टिक, मरे हुए जानवर और यहाँ तक की शौचालय करने से भी नहीं चुकते हैं। उसी में थुक-खखार भी फेक दिया करते है और उसी में बड़े खुशी से स्नान भी कर लेते है, साथ-ही-साथ पुजा के लिए जल भी ले लिया करते हैं। उसमें स्नान करने के बाद या पहले हर-हर गंगे करते हुए नहाते हैं, पूजा करते हैं। फिर लौट जाने के बाद उसी में अपना गंदगी बहाने में नहीं चुकते हैं। तब भी गंगा उस दूषित जल को स्वच्छ करती रहती है, गंगा माता पाप हरने के लिए उतरी धरती पे मगर साथ-साथ गंदगी को भी हर रही हैं। हिन्दु धर्म में यह बात कही गई है कि प्रलय आने के कुछ हजारों वर्ष पुर्व गंगा हमे छोड़ कर चली जायगी, मतलब सूख जाएगी। उसके बाद प्रलय आयेगा।

इसलिए हमलोगों का यह फर्ज है कि गंगा को पवित्र और निर्मल बनाये रखें, ताकि जब ये वापस जाये तो हमें अपने गलती पर ज्यादा पछतावा न हो। इस सारे नाले को दूसरी तरफ मोड़ा जाए और हमलोग भी गंदगी न फैलाये।

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