घर बनवाने से पहले जानें वास्तु के अनुसार सभी दिशाओं और तत्वों का महत्व

वास्तु शास्त्र का महत्व हमारे भारत देश में प्राचीन काल से ही देखा जाता रहा है। ऐसा नहीं है कि वास्तु का महत्व केवल भारत में ही है अलग-अलग देशों में वास्तु शास्त्र को अलग-अलग नामों से जाना जाता है जैसे चीन में लोग फेंग शुई के अनुसार घर बनवाते या सजावट करते हैं।

वास्तु में मुख्य रूप से दिशाओं का महत्व होता है। वास्तु में हमें सभी दिशाओं का निर्धारण करना होता है इसके लिए हम किसी भी भूखण्ड को नौ भागों में बाँटते हैं। पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण तथा इन चारों दिशाओं के बीच के चारों कोने उत्तर-पूर्व (ईशान), दक्षिण-पूर्व (आग्नेय), दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य) और उत्तर-पश्चिम (वायव्य कोण) तथा भूखण्ड के मध्य का स्थान।

किसी भी क्षेत्र को चारों ओर से जब घेरा जाता है तो वहाँ वास्तु शास्त्र के उचित ज्ञान के द्वारा सही वास्तु नियमों का उपयोग करके ही हम उस स्थान को सुख और शांति भरा निवास स्थान/कार्यालय/भवन बना सकते हैं। वास्तु को एक पुरूष के समान बताया गया है अर्थात् जिस तरह एक मनुष्य का शरीर पाँच तत्वों से मिलकर बना है ठीक उसी तरह वास्तु में भी इन पाँच तत्वों का सामंजस्य होता है। प्रत्येक दिशा के लिये अलग-अलग तत्वों का महत्व होता है। अगर आप कोई भवन/मकान बनवाने जा रहे हैं तो सभी दिशाओं और तत्वों के आधारभूत गुणोें को जानना आपके लिए आवश्यक है। तो आइए जानते हैं दिशाओं और तत्वों का महत्वः-

  • पूर्व दिशा – पूर्व दिशा का स्वामी सूर्य है। भवन निर्माण करते समय पूर्व दिशा में कुछ खाली स्थान अवश्य छोड़ना चाहिए। इस दिशा में कोई अवरोध नहीं होना चाहिए। अगर पूर्व दिशा दूषित होगी तो व्यक्ति के मान-सम्मान और वंश वृद्धि में हानि होगी। इस दिशा में स्नानघर रखना ठीक होता है।
  • पश्चिम दिशा – पश्चिम दिशा का स्वामी शनि है। इस दिशा में स्नानगृह, द्वार या बारिश का पानी निकलने का नाली नहीं होना चाहिए अन्यथा पुरूष लम्बी बिमारियों का शिकार हो सकते हैं।
  • उत्तर दिशा – इस दिशा का स्वामी बुध होता है। इस दिशा में तिजोरी रखना अच्छा होता है। इस दिशा में घर के ज्यादातर खिड़की और दरवाजे होने चाहिए। अगर यह दिशा खाली नहीं है तो घर के सदस्यों को कष्ट होता है तथा कन्या के जन्म में दिक्कत आती है। इस दिशा में निष्प्रयोजन सामग्री, गोबर के ढेर या टीले संकट को न्योता देते हैं।
  • ईशान कोण – ईशान कोण के स्वामी जल हैं, अतः कुआँ, नलकूप, पानी की टंकी या कोई भी जल का स्रोत यहाँ पर होना चाहिए। यह कोण धैर्य, बुद्धि, ज्ञान, विवेक आदि प्रदान करता है। यहाँ देवता निवास करते हैं इसलिए इस कोण को कभी बंद नहीं करना चाहिए। इसे पूरी तरह शुद्ध और पवित्र रखना चाहिए। यदि यह दिशा दूषित होगी तो घर में कलह का माहौल होगा, बुद्धि भ्रष्ट हो जाएगी तथा संतान रूप में प्रायः कन्या का जन्म होगा।
  • दक्षिण दिशा – दक्षिण दिशा का स्वामी मंगल है। यह दिशा समृद्धि की दिशा है। इस दिशा की भूमि तुलनात्मक रूप से ऊँची होनी चाहिए। भारी चीजें इस दिशा में रखी जाती हैं। इस दिशा में भंडारगृह होना अच्छा होता है। इस दिशा को पूर्णतः बंद रखना चाहिए। अगर यह दिशा खुली होगी तो शत्रु, भय और रोग से परेशानी होगी। इस दिशा में किसी प्रकार का खुला स्थान तथा शौचालय आदि नहीं होना चाहिए। इस दिशा का सही उपयोग धैर्य स्थिरता देकर सभी बुराईयों को नष्ट करने वाला साबित होगा
  • नैऋत्य कोण – इस दिशा का स्वामी पृथ्वी है। इसलिए इस दिशा का उपयोग अपने लिए करना चाहिए। इस दिशा में छोटे एवं कम दरवाजे खिड़कियाँ होने चाहिए। यह कोण व्यक्ति के चरित्र को प्रभावित करता है। यदि भवन का यह कोण दूषित रहता है तो उस भवन में रहने वाले व्यक्तियों का चरित्र भी ठीक नहीं रहता। इस कोण के दूषित रहने से अचानक दुर्घटना होने के साथ-साथ अपमृत्यु का भी योग बनता है। इस दिशा को भारी रखना चाहिए यदि इस दिशा में खाली स्थान है तो गृहस्वामी का खजाना खाली रहता है और वह शत्रुओं तथा बीमारी से पीड़ित रहेंगें।
  • वायव्य कोण – इस दिशा का स्वामी वायु है। यह कोण मुख्य रूप से एक दूसरे से संबंध को प्रभावित करता है। अगर यह कोण दूषित है तो परिवार में कलह, सुख शान्ति में कमी होती है। इस दिशा में अतिथी गृह और अनाज का भंडारण रखना ठीक होता है।
  • आग्नेय कोण – इस दिशा का स्वामी अग्नि है। आग्नेय कोण मुख्यतः स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। अग्नि से संबंधित चीजों को इस दिशा में रखा जाता है। रसोईघर इस दिशा में होना अच्छा होता है।
  • मध्य का स्थान – मध्य के स्थान का स्वामी आकाश होता है इसलिए यहाँ किसी प्रकार का बनावट नहीं होना चाहिए। यह स्थान पूर्णतः खुला होना चाहिए।

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