छठपूजा क्या है और छठपूजा विधि

                                                           छठपूजा क्या है और छठपूजा के पूर्ण विधि को जानें

भारत एक विशाल देश है यहाँ अनेक पर्व अनेक तरीके से मनाया जाता है। भारत के कई स्थानों पर छठ पर्व मनाया जाता है, मगर भारत के राज्यों में से एक बिहार राज्य में छठपर्व का कुछ विशेष स्थान है। वैसे तो बहुत पर्व मनाये जाते है हमारे बिहार में, परन्तु सबसे बड़े और पवित्र छठपर्व है जो पूर्ण श्रर्द्धा एंव समर्पण के साथ हमारे बिहार के माताएँ और भाई लोग मनाते हैं। आज मैं इस पवित्र छठ पूजा को अपने शब्दों से आपके बीच साझा करूँगा। छठपर्व पवित्र,भक्ति,भाई-चारे से पूर्ण है,इसे करने के लिए शुद्ध मन और संकल्प आवश्यक है। हमारे इस पूर्ण छठ-पूजन विधि में अगर कोई विधि छूट जाये या गलती हो जाए तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ।

छठपर्व कब और कैसे मनाया जाता है –

छठपर्व एक वर्ष में दो बार मनाया जाता है। प्रथम हिन्दीं महीने के चैत्र शुक्लपक्ष छः को मनाया जाता है, दूसरा कार्तिक महीने के शुक्लपक्ष छः को भी भव्य-रूप से मनाया जाता है। यह दीपावली के बाद मनाये जाने वाला पर्व है, इसकी साफ-सफाई दीपावली से पहले ही होने लगती है। दिपावली मनाने के बाद छठपर्व की तैयारी शुरू हो जाती है।यह पर्व (चतुर्थी,पंचवीं,छठवीं,सप्तमी) चार दिनों तक चलने वाला पर्व है। जिसका घर कच्चा होता है वह अपने घरों को गाय के गोबर से निपते है और जिसका मकान पक्का का होता है वह अपने घरों को शुद्ध पानी से धोते है। कच्चा घर हो या पक्का छठवर्ती अपने लिए एक मुख्य कमरा को चुनती है। जिसमें वे चार दिनों तक इसी कमरा में रहते हैं,सोते हैं और प्रसाद बनाते हैं।

छठपर्व कौन कर सकते हैं और क्यों मनाया जाता है –

यह पर्व विवाहित स्त्री और पुरूष दोनों कर सकते हैं। जो यह पर्व करते हैं, उनके लिए नया सूती वस्त्र बिना फटा हुआ खरीदनी चाहिए। स्त्री हो तो सूती साड़ी (खरीदने के बाद उस साड़ी में कोई अलग से सिलाई नहीं होनी चाहिए) और पुरूष हो तो धोती/गमछा होनी चाहिए।

परिवार में सुख और शांति बना रहे और कोई अनहोनी न हो इसलिए छठपर्व मनाया मनाया जाता है। अगर कोई इच्छा पुर्ण हो गया हो तो भी लोग खुशी में यह पर्व मनाते हैं। हमेशा हमारे शरीर स्वस्थ और निरोग बना रहे इसके लिए भी छठपर्व मनाया जाता है। यह पर्व करने से कितने लोगों का मनोवांछित कार्य पूरा हुआ है।

अब देखते हैं छठ पुजा की चार दिनों की पूजन-विधि –

नोट- इस छठपर्व में कोई भी घर में माँस,शराब,लहसुन-प्याज नहीं खाते हैं और सेंधा नमक का उपयोग करते हैं।

पहला दिन- (चतुर्थी) नहाय खाय –

पहला दिन चैत्र या कार्तिक शुक्ल चतुर्थी ‘नहाय खाय’ के रूप में मनाया जाता है। सबसे पहले घर की सफाई और प्रसाद बनाने वाले बरतन की धुलाई। उसके बाद चना दाल, अरवा चावल और कद्दू का प्रसाद बनाया जाता है। परिवार के सारे सदस्य मिलकर यह प्रसाद को प्रेम पूर्वक ग्रहण करते हैं। फिर अगले दिन का समान खरीदते है।

पूजन में उपयोग होने वाली सामग्री –

1) बाँस के बने हुए एक या दो टोकरी/दउरा अपने प्रसाद के अनुसार सारा उसमें रखा जाना चाहिए।
2) अपने इच्छा संकल्प के अनुसार दो,तीन,चार,पाँच सूप (अर्ध्य चढ़ाने के लिए) कोई अन्य धातु के बने सूप जैसे पीतल,चाँदी भी ले सकते हैं।
3) जितने लोगों के लिए प्रसाद बना रहे हैं उस हिसाब से आम का सूखा लकड़ी 5 से 15 किलो लगभग और गाय का गोयठा 10 से 20 आग जलाने के लिए।
4) गुड़ अपने जरूरत के अनुसार 2 से 5 किलो तक।
5) शुद्ध गेंहूँ अपने जरूरत के अनुसार खरीदें और उसे पीस से या पीसवा लें (अपने जाँता में या चक्की में)।
6) जितना गेंहूँ उसके आधा अरवा चावल लेकर उसे भी पीसवा लें (लड्डू और पिठ्ठा के लिए)।
7) शुद्ध गाय का घी लगभग 2 किलो।
8) अगरबत्ती,सलाई,सिन्दुर,रोली,दिया,मिट्टी की दो-दो छोटा कपटी और एक बड़ा प्लेट।
9) बिना छीला हुआ नारियल,गन्ना,केला ये मुख्य फल है इसके अतिरिक्त मौसमी फल कोई भी दो कुल पाँच फल होनी चाहिए।

दुसरा दिन- पंचवीं, लोहंडा/खरना (खीर,रोटी और चावल का पिठ्ठा का प्रसाद) –

1) दुध, अरवा चावल, गुड़   की सहायता से बना खीर।
2) गेंहूँ के आटे से बना रोटी।
3) चावल के आटे से बने हुए गोल-गोल पिठ्ठा।

बनाने की विधि –

1) सबसे पहले ईट और मिट्टी  के बने चुल्हा या लोहे की चुल्हा का उपयोग किया जाता है,बिल्कुल शुद्ध।
2) शुद्ध ताजा पिसा हुआ गेंहूँ का आटा प्रबंध करना और उससे रोटी बनाना।
3) चावल का आटे को गोल-गोल करें और उसे उबाल कर पिठ्ठा तैयार करलें।
4) दुध, अरवा चावल, गुड़  की सहायता से बना खीर।( चीनी का उपयोग न कर गुड़ का उपयोग करें)

नोट- यह प्रसाद बनाने के लिए 11 बजे से 12 बजे के बीच प्रारंभ कर दें,क्योंकि इसमें 4 से 5 घंटे का समय लग जाता है।प्रसाद बनाते समय सिर और मुँह को ढ़क लें ताकि प्रसाद में थूक,बाल,कंकर न जाए। अगर छठवर्ती को प्रसाद ग्रहण करते समय कुछ भी मिल जाता तो उसे प्रसाद त्यागना पड़ जाता है और अगले दो दिन तक कुछ भी खाना नहीं हैं। इसलिए प्रसाद को बहुत अच्छे से बनायें।

प्रसाद बन जाने के बाद छठवर्ती सारे प्रसाद का थोड़ा सा हिस्सा छठमाता को चढ़ा दें और पुष्प, दिया से पुजन कर लें, फिर एक हिस्सा गौ माता के लिए निकाल दें और एक हिस्सा अपने लिए लें और ध्यान कर उसे ग्रहण कर लें और सारा बचे हुए महाप्रसाद को अपने परिवार, मित्र के साथ खायें।

तीसरा दिन- डाला छठ का सायं अर्ध्य (तिथि षष्ठी) –

इस दिन छठवर्ती ठेकुआ/खमौनी और चावल का लड्डू बनाती हैं।
विधि-
1) गेंहूँ का आटा, गुड,जल़ और घी के सहायता से आटा को गुथ लें और छोटे-छोटे कर उसे अपने हथेली से दबा कर कड़ाही में छान लें शुद्ध धी में।
2) चावल के आटें में घी,जल की सहायता से उसका लड्डू बना लें।

उसके बाद सारे प्रसाद को एकत्र कर सूप में रख दें (फल, ठेकुआ, लड्डू, अगरबत्ती, माचिस, दिया, हुमाद, सिन्दुर,रोली) फिर सूप को दउरा (टोकड़ी) में रख लें और कपडे़ं से बाँध लें और स्नान करने के बाद पुरूष लेकर निकल जायें फिर पिछे से महिला लोग,छटवर्ती गीत गाती हुई जायें नदि में खड़े होकर सूर्य को अर्ध्य दें और पुजा कर घर वापस आये। सारे प्रसाद को अच्छी तरह रख दे क्योंकि अगले दिन सप्तमी को ये सारा प्रसाद फिर से लें जाना है।

चौथा दिन- प्रातः काल अर्ध्य (शुक्ल पक्ष सप्तमी)-

अगले दिन सुबह 3 से 4 बजे तक सभी लोग स्नान कर चार बजे के बाद निकल जायें और महिला लोग सूर्य उगने के आधे घंटे पहले पहुँचे और उगते सूर्य को जल में खडे़ होकर पुजा करें और सारे प्रसाद का अर्ध्य दें उसके बाद हुमाद जलाकर हुमाद दें और नींबू,चीनी और जल की सहायता से व्रत को खोलें और वापस घर आ जायें फिर सारे लोग चावल,दाल,आकाश के फूल को बना कर खायें और प्रसाद बाँटें।
इस तरह छठपर्व समाप्त हुआ।

बोलो छठ मैया की जय।

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