डॉलर के मुकाबले रूपया कमजोर क्यों

स्वर्गीय श्री राजीव दीक्षित द्वारा किया गया रिसर्च डॉलर के मुकाबले रूपया कमजोर क्यों हैं-

हमलोग जानते हैं कि भारत एक कृषी प्रधान देश रहा है, तो आसान-सा बात है कि खेत और किसान भाई सब हमसब के लिए बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं मतलब वो हमारे अन्नदाता हुए।

सरकार की सबसे बड़ी गलती कि किसानों के तरफ ध्यान नहीं दिया, खेतों के तरफ ध्यान नहीं दिया। पूँजी के लिए विदेशों से कर्ज माँगना शुरू कर दिया, जिस भारत ने अपने जीवन काल में किसी से कर्ज नहीं लिया था। उस भारत ने आजादी के बाद सन् 1952 में पहली बार दुनिया से कर्ज माँगा। आपको ये सुनकर ये बहुत दुःख होगा कि 1947 तक हम दुनिया में एक ऐसे देश थे, जिसपर एक रूपया का कर्ज नहीं था, फिर 1952 में हमारी सरकार ने विदेशी कर्ज लेना शुरू कर दिया। जब कर्ज लेना शुरू कर दिया तो कर्ज देने वालों ने अपनी शर्तो का हमारे ऊपर लगाना शुरू कर दिया। आप किसी से भी कर्ज लेंगे तो वे फोकट में तो कर्ज नहीं देगा, आप बैंक कर्ज माँगने जाते हैं न, तो वे अपनी शर्त बताती है। उसी प्रकार हमनें भी विश्व बैंक से कर्ज माँगा तो विश्व बैंक ने अपनी शर्त बताना शुरू कर दिया और उनकी शर्त ये थी कि जिस मूद्रा पर भारत कर्ज लेगा उसकी मूल्य बढ़नी चाहिए। मतलब भारत अगर डॉलर में कर्ज लेगा तो डॉलर की कीमत बढ़नी चाहिए, भारत अगर लेगा स्त्री0 पाउण्ड में कर्ज, तो पाउण्ड की कीमत बढ़नी चाहिए। जो भी विदेशी मुद्राओं में हमने कर्ज लेना शुरू किया उन मुद्राओं की कीमत बढ़ती गई और उस कीमत को बढ़ाने के लिए भारतीय सरकार ने अपने रूपयों की कीमत गिराना शुरू कर दिया। 1952 में रूपये की कीमत गिरी, 15 अगस्त 1947 को एक रूपया के बराबर एक डॉलर था, एक रूपया एक पॉउण्ड के बराबर था लेकिन 1952 आते आते यह 7रू बराबर 1डॉलर हो गया।

फिर हमने दुबारा 1957 में कर्ज लिया, फिर 1962 में लिया, फिर 1967 में लिया, फिर 1972 में लिया, फिर 1977 में लिया, फिर 1982 में लिया, फिर इसके बाद प्रत्येक साल कर्ज लेना शुरू कर दिया। पहले 5 साल पर कर्ज लेते थे उसके बाद हर साल लेने लगे- 1984, 1985, 1986 लगातार और कई-कई प्रधानमंत्री ऐसे आये महानूभाव इस देश में जिन्होंने पुराने कर्ज के ब्याज को नये कर्ज लेकर चुकाने लगे, ऐसे भी प्रधानमंत्री आये इस देश में, उन्होंने कर्ज के सारे सीमा तोड़ दी। उसके बाद परिणाम क्या हुआ कि कर्ज और ब्याज बढ़ता चला गया। 1991 से इस देश में एक नीति चल पड़ी, जिसका नाम शायद आप जानते होंगे उदारीकरण फिर एक नीति वैश्वीकरण, मैंने इस नीति का नाम रखा उधारीकरण कर्ज लेना, उधार लेना, कर्ज लेना, उधार लेना। जितने भी प्रधानमंत्री आये सब ने अंधा-धुध कर्ज लिया फिर बढ़ते-बढ़ते अब कर्ज बहुत अधिक हो गया। इन सरकारों ने क्या किया विदेशी कर्ज लिया और देश के अन्दर से भी कर्ज लिया, दोनों तरफ से कर्ज लेले के विकास करने की नींव डाली। सबसे खराब काम हुआ कि कर्ज लेकर विकास करना, हमारे भारत की परम्परा क्या है कि ‘‘जितनी लंबी चादर उतने लंबे पैर’’ ये भारत की परम्परा है यदि हमारे पास कम पैसे हैं तो कम पैसे से ही काम चलाओ, लेकिन सरकारों ने इसका उल्टा कर दिया, उन्होंने कहा कि चादर अगर कम पड़ गई तो चादर भाड़े पर ले आओ, तो कर्ज लेले के आज देश के ऊपर इस समय 18लाख करोड़ का तो विदेशी कर्ज हो गया। (यह कर्ज 2010 तक का है मतलब ये आगे और बढ़ी होगी।) केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों पर और लगभग 18 लाख करोड़ का देश के अन्दर का कर्ज है, मतलब आज देश 36 लाख करोड़ के कर्ज में दबा हुआ हैं। अगर आप हिसाब निकालेगें तो आज भारत का एक नागरिक पर 36 हजार रूपये का कर्जदार है, ये स्थिति हो गई है।

इसमें परेशानी क्या आई कि हमने जहाँ विदेशों से कर्ज लिया अमेरिका, जर्मन, जापान। इन देशों ने हमारी ऊपर शर्त लगाई, तो पहले शर्त तो मैं ने बताई रूपये की कीमत घटाओ और जिस म्रद्रा में कर्ज ले रहे हो उसका मूल्य बढ़ाओ, तो डॉलर की कीमत बढ़ते-बढ़ते कहाँ तक आई, 1947 में एक डॉलर बराबर एक रूपया था अब हो गया है 50रू बराबर 1 डॉलर। मतलब रूपये की कीमत अब 50 गुणा कम हो चुकी है, 1947 में एक रूपया बराबर एक स्त्री0 पाउण्ड था और अब हो गया है 80रू एक स्त्री0 पाउण्ड। एक मुद्रा आई है दुनिया में जिसका नाम है यूरो डॉलर, एक यूरो डॉलर बराबर 56 रूपये हो गया। हर एक दुनिया में मुद्रा की तुलना में हमारी रूपया कमजोर है। दूसरा शर्त हमारे ऊपर क्या लग गई कि जो-जो देश से हम कर्ज लेंगे उन्हीं देशों की कम्पनियों को भारत में व्यापार करने के लिए बुलाना होगा। हम अमेरिका से कर्ज लेंगे तो हमें उन्हें लाइसेंस देना होगा व्यापार करने में, अगर जापान से कर्ज लेंगे तो वहाँ की कम्पनियाँ को लाइसेंस देना पड़ेगा। भारत की सरकार ने 24 देशों से कर्ज ले रखा है तो 24 देश की 5000 कम्पनियाँ घुस चुकी है हमारे देश में ये स्थिति है। अब दुःख की बात ये है कि हमने एक ईस्ट इण्डिया कम्पनी को 100 साल की मेहनत करके मारके भगाया था, उन्हें भगाने में लाखों शहीदों की कुरबानी देनीं पड़ी थी। करोड़ो भारतवासियों को अपनी माँ, बहन बेटियों का बेइज्ती सहना पड़ा था। अब आजादी के बाद भारत ऐसा चक्कर में फँस गया कि 5000 से ज्यादा विदेशी कम्पनियाँ फिर आ गई। अब इन कम्पनियाँ से आने से फिर नुकसान, पहले ईस्ट इण्डिया आई वो माल बेचकर मुनाफा कमाती थी और अब ये 5000 हजार कम्पनी, नुकसान दोहरा हो रहा है। रूपया की कीमत जैसे-जैसे गिर रही है न, बहुत नुकसान होता है इस देश का। आप समझते हैं कि कैसे नुकसान हो रहा है? 1947ई0 में अगर एक रूपये का सामान बेचते थे तो एक डॉलर आता था। अब 2009 में 50रू का सामान बेचना पड़ता है तो मात्र एक डॉलर मिलता है मतलब हमारा सामान ज्यादा जाता है और रूपया कम आता है।

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