दीपावली

दीपावली रोशनी का त्योहार है जो हर वर्ष मनाये जाने वाला हिन्दु त्योहार है। कार्तिक अमावस्या की काली अँधेरी रात, चारों तरफ अंधकार-ही-अंधकार। हाथ को हाथ नहीं सूझता। इसी बीच अगर दिप जल जाए, तो सारे अंधकार को मिटा देती हैं। दीवाली भारत के सबसे बड़े त्योहारों में से एक है। यह त्योहार आध्यात्मिक रूप से अंधकार पर प्रकाश की विजय को दर्शाता है। इसे सिख,बौद्ध तथा जैन धर्म के लोग भी मनाते हैं। जैन धर्म के लोग इसे महावीर के मोक्ष दिवस के रूप में मनाते है तथा सिख समुदाय इसे बन्दी छोड़ दिवस के रूप में मनाता है।

माना जाता है कि दिपावली के दिन अयोघ्या के राजा राम अपने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात लौटे थे। श्री राम के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीपक जलाए। कार्तिक मास की काली अमावस्या की वह रात्रि दीयों की रोशनी से जगमगा उठी। तब से आज तक हम भारत लोग प्रति वर्ष यह प्रकाश-पर्व हर्ष व उल्लास से मनाते है। दीपावली स्वच्छता व प्रकाश का पर्व है। कई सप्ताह पूर्व ही दीपावली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती हैं। लोग अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई का कार्य आरंभ कर देते है। घरों में मरम्मत, रंग और सफेदी का कार्य होने लगता है। दीपावली के दो दिन पहले धनतेरस मनाया जाता है, धनतेरस के शाम को लोग नये कपड़े,घर का सामान, उपहार, सोने-चाँदी के बने सामान खरीदते है। इस दिन लोग ज्यादा धातु से बने सामान खरीदते हैं। माना जाता है कि इस दिन धातु के बने सामान को खरीदने से घरों में कभी भी आर्थिक संकट नहीं आता है। हमेशा धन बढ़ता ही है, घटता नहीं।

दीपावली जब आती है, तब सांस्कृतिक त्योहारों की एक श्रीखला ले आती है, एक के पीछे एक आनेवाले पाँच त्योहारों को उपस्थित कर देती है। त्रयोदशी को धनतेरस का यमदीप जलाया जाता है, अकालमृत्यु से बचने के लिए यमराज का आर्शिवाद प्राप्त किया जाता है। चतुर्दशी को नरकचतुर्दशी का त्योहार मनाया जाता हैं और नरक गंदगी को भी कहते है, जहाँ गंदगी है वहाँ रोग है, जहाँ रोग है वहाँ मृत्यु- यमराज हैं। इसलिए साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता है। दीपावली के दुसरे दिन ‘गोवर्धनपूजा’ की जाती है। क्योंकि इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने अपनी छोटी उँगली पर गोवर्धन धारण कर ब्रजवासियों का मृत्यों से मुक्त किये थे। द्वितीया के दिन ‘भाईदूज’ का त्योहार मनाया जाता है, जो यमराज और उनकी बहन यमी के पावन प्रेम के साथ-साथ सभी भाई-बहनों के पवित्र एवं व्यापक प्रेम की याद दिलाता है।

दीपावली के अवसर पर दीवारों पर ‘शुभ-लाभ’ लिखा जाता है, दरवाजों पर दीर्घायु और कल्याण के प्रतीक ‘स्वास्तिक के चिन्ह बनाए जाते है तथा संपत्ति और ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है। लक्ष्मी पूजा के साथ हम अपनी राष्ट्रलक्ष्मी का आवाहन करते हैं, ताकि हमारा राष्ट्र श्री-संपत्ति में विश्व के किसी राष्ट्र से कम न रहे। किन्तु, आज हमारे राष्ट्र के व्यापारी वर्ग अनुचित तरीके से धन कमाता है और उसे राष्ट्रहित में लगाने के बजाए अपने स्वार्थ की तिजोरी में  बंदकर रखता है। छिपा हुआ यह समस्त धन समाज के लिए वैसा ही हो जाता है, जैसा हाथ या पाँव में बहता हुआ रक्त रूक जाए। शरीर में कहीं रूका हुआ रक्त जिस प्रकार बुढ़ापा लाता है, उसी प्रकार छिपा हुआ धन भी राष्ट्र को भी दुर्बल और कमजोर बनाता है।

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