धारा 370 और 35ए क्या है-

स्व0 राजीव दीक्षित के व्याख्यान के द्वारा जानें कि जम्मू कश्मीर में धारा 370 क्यों लागू है क्यों भारतीय सरकार हर साल लाखों रूपया कश्मीर में भेजता है, क्यों भारतीये सेना की सबसे ज्यादा जान-माल की हानि वहाँ होती है? पूर्ण व्याख्यान को पढ़ें-

भारत द्वारा पाकिस्तान का एक हिस्सा को अलग कर बंग्लादेश बनाना। सन् 1971 ई0 में पाकिस्तान से बंगलादेश अलग कर एक देश बना था। आज उसी का परिणाम है कि उस हिस्से का दर्द आज तक पाकिस्तान नहीं भूला है। जिसके कारण वा कहता है कि तुमने हमसे बंग्लादेश को अलग किया है और मै तुमसे कश्मीर अलग कर दूगाँ। 1971 ई0 के बाद पाकिस्तान में जितने भी शासक बने, सभी ने कहा कि कश्मीर में आंतकवाद होना चाहिए। इसके लिए पाकिस्तान से सैनिक, धन और आंतक भेजकर कश्मीर में दंगा किया जाने लगा। 1972 के बाद हमारे भारतीय सैनिक हजारों के संख्या में मारे जाने लगे हैं और अभी तक मर रहे हैं। भारत सरकार द्वारा कश्मीर भारत में रहे उसके लिए एक कानून बनाया गया था – धारा 370 । विश्व के किसी संविधान में ऐसा कानून कभी नहीं बना है। उस धारा 370 के तहत कश्मीर को एक देश का दर्जा दिया गया है। आप जानते है भारत में सुप्रीम कोर्ट अगर कोई कानून बनाये तो वह कानून भारत के सभी राज्यों में मान्य होगा परन्तु कश्मीर में नहीं होगा। संसद के कानूनी दस्तावेज के प्रथम पन्ना में लिखा होता है कि ये कानून कश्मीर में मान्य नहीं होगा। कश्मीर में भारतीय तिरंगा हो इसका कोई जरूरी नही, वहाँ जो कार्यकाल संभालता है उसके मुताबिक झंडा होता है। सिर्फ नाम का भारत में कश्मीर है यह कहा जाता है।

जम्मू-कश्मीर में हर साल भारतीये सरकार लाखों खर्च कर देती है, उसका हिसाब नहीं रखा जाता है। भारत के दूसरे हिस्से में किया गया खर्च का पाई-पाई का हिसाब रखा जाता है। मैने बहुत बार सी0 एन0 जी0 को पत्र लिखा कि भारत सरकार जो भी खर्च कश्मीर पर करता है वह बता सकते हैं तो वह मुझे बताया कि हमारे पास कोई जानकारी नहीं है। उसके बाद मैने वित्तमंत्री को पत्र लिखा तो उन्होंने लिखा कि हमारे पास काई जानकारी नहीं है इसका पूरा हिसाब सिर्फ कश्मीर में रहता है। मैने कश्मीर गया और पूछा तो उन्होने बताया कि इसकी जानकारी मै आपको दे नहीे सकता हूँ। वहाँ की सरकार नहीं मानती है कि वह भारत के अंग हैं। पाकिस्तान आंतक फैलाता रहता है पैसा देता रहता है और भारत के लोग मुंह देखते रहते हैं और कहते रहते है कि कश्मीर हमारा है। अमेरिका पाकिस्तान को पैसा भेजता रहता है जिसके मदद से पाकिस्तान आंतकी संगठन बनाता रहता है फिर विभिन्न देश में आंतकी फैलता रहता है। भारतीये आर्मी कहती है कि ये सारे आंतकी पैसे के लिए काम करती है दुसरे देशों से भी जुड़े रहते हैं। पाकिस्तान में आदमी है याशीद मल्लिक। भारत सरकार जब भी बात करती है तो उसी से करती है। वह इतना पतला है कि एक हिन्दूस्तानी एक थप्पर मार दे तो वह दो बार जरूर पलटी खा जाये। मग रवह इतना हैवान है कि अगर आप उससे दूध मांगोगे तो वह जहर देगा।

पाकिस्तान से जैसे कोई आतंक का खबर आता है वैसे ही अमेरिका पैसा भेज देता है। आप पूछेगें कि अमेरिका को क्या रूचि है कश्मीर में, तो पाकिस्तान से ज्यादा जरूरत अमेरिका को है क्योकि उसका पूराना दुश्मनी चीन से है वह कश्मीर को कब्जा मे लेकर वहाँ लड़ाकू विमान रखना चाहता है ताकि वह चीन पर बम गिरा सके। तो आप कहेगें कि राजनिति चल रहा भारत को बर्बाद करने की तो हम सब क्या कर सकते हैं इसमें। मैं आपको एक विनम्र निवेदन कर रहा हूँ कि आप कभी भी घुमने के लिए कश्मीर न जाए। वहाँ की सरकार आपसे कुछ ज्यादा ही टैक्स लेती है और वह सारा पैसा आंतकियों को पनाह देने मदद करता है। वहाँ की सरकार ही आंतकियों से मिली हुई है। आप कहगें कि भारत के सबसे खुबसूरत जगह में क्यों न जाएँ? आप जानते है कुछ वर्ष पूर्व ही एक आदमी की फाँसी हुई है उसका नाम है- अफजल गुरू। ये भारतीय संसद पर हमला करने का प्लान बनाया था और सर्वोच्य न्यालय ने इसे फाँसी देने का आदेश दिया था। लेकिन उसे बहुत देर तक फाँसी नहीं हुई थी। मतलब समझते हैं भारत में ही बैठे बड़े-बड़े नेता या अफसर ही उसे बचाने के लिए बैठे हुए थे। उस समय एक ऐसा स्थिति बनाया गया था जिसमें अफजल गुरू की फाँसी वाला फाइल गायब कर दिया गया था। सभी लोग ऐसा कह रहे थे कि उसका फाइल राष्ट्रपति ए0पी0जे0 अब्दुल कलाम के पास भेज दिया गया है और उन्होंने वह फाइल रोक रखी है। जब अब्दुल कलाम रिटायर हो रहे थे तो अपने लास्ट स्टेटमेंट कहा था कि उनके पास ऐसी कोई फाइल नहीं आई थी। वो फाइल कहाँ है तो वह गृह मंत्रालय के पास है जिसका मंत्री शिव राज पाटिल है। अगर वह फाइल राष्ट्रपति के पास पहुँच जाती तो तुरंत फाँसी हो जाता अफजल गुरू को। उसे बचाने वाला आदमी भारत के गुहमंत्री में बैठा हुआ था।
अब प्रश्न ये उठता है कि आप किस आंतकवाद को कुचलना चाहते हैं जो देश के अन्दर ही बैठा हुआ है। मेरा कहना बहुत स्पष्ट है कि हमारे मंत्रालय में ही आंतकियों का सुरक्षा किया जाता हैं। आप कौन से आंतकवाद से लड़ना चाहते है वैसा आदमी जो फाइल पहुंचने ही नहीं दे रहा है सही जगह, आखिर क्यों वह फाँसी रूकवाना चाहता था? क्योंकि अफजल गुरू एक ऐसे समुह का सदस्य है जो भारत सरकार पैसा लेकर आंतकियों में बॉटता है। दिल्ली सरकार से लाखों रूपया कश्मीर को जाता है पर उसका हिसाब नहीं दिया जाता है। सारा पैसा वहाँ के नेता में बँटता है और आतंकियों में।

मैंने एक दिन सोचा कि आर्मी जब युद्ध करती है तो सबसे पहले दुश्मनों को मिलने वाले मदद को ध्वस्त करती है ताकि उसे सुरक्षा न मिल सके तब हमारे सैनिक को विजय प्राप्त होती है। उसके बाद मुझे समझ आया कि आंतकियों का पहला मदद सरकार और दूसरा मदद भारतीये जनता करती है। हमारे द्वारा आंतकियों का मदद का पहला स्रोत हमलोगों का वहाँ जाना है। मेरा मानना है कि अगर भारतीये नागरिक वहाँ न जाएँ, कम-से-कम 2 साल तक और साथ में जब कश्मीरी लोग हमारे शहर या गांव में आयें अपने सामान बेचने जैसे- शॉल, तो उन्हें हाथ जोड़ कर कहें कि हम आपका सामान नहीें खरीद सकते है, तो वह बोलगा क्यों? तो आप बोले कि जब तक आप अपने कश्मीर को भारत का अंग घोषित न कर दें तब तक। क्या पता जो सामान बेच रहा हो वो एक अच्छा इंसान है या आंतकवादी। उसके बाद 2 साल में वहाँ के लोगों का दिमाग ठिकाने पर आ जायेगा और झख मारके कश्मीर भारत में विलय हो जायेगा, क्योकि उनमे दम नहीं है। दुसरी बात वैष्णों देवी मंदिर भी न जायें क्योंकि वहाँ दिया गया सारा धन-दान, मंदिर से कहाँ जाती है इसका कोई भरोसा नहीं है। मुझे आप से विनम्र निवेदन है कि वहाँ न जायें। हिन्दू सभ्यता के अनुसार हर मंदिर, हर कण में भगवान का वास है तो वहीं जाकर दान-धर्म करना क्यों जरूरी है।

भूतकाल में कश्मीर के मामले में हुआ ये था कि कश्मीर के राजा हरि सिंह थे। उनके दिल में अंग्रेजों ने यह आशा पैदा कर दिया था कि वे उन्हें अलग देश या राज्य बना देगें और वे इसी का गाना गाया करते थे। अंग्रेजों के मन में था कि जम्मू-कश्मीर अलग हो जाए जैसे पाकिस्तान अलग हुआ था। अंग्रेज इस आग में घी डाल रहे थे। उसी समय पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया और जैसे ही कश्मीर पर हमला हुआ तो वैसे ही हरि सिंह के हाथ पाँव फूल गये। उनके पास पर्याप्त सेना नहीं थी, उन पाकिस्तानियों से लड़ने के लिए, अब उन्हें कोई रास्ता नहीं दिख रहा था। पाकिस्तान के सेना कश्मीर पहुँचनें वाले ही थे। वे सपने पाले हुए थे कि उन्हें अपना देश मिलेगा या राज्य मिलेगा, मगर अब तो श्री नगर और कश्मीर भी जाने वाला है हाथ से। इसके बाद उन्होंने सरदार बल्लभ भाई पटेल के पास अपना प्रधानमंत्री को भेजा और कहा कि हमे बचा लो। उसके बाद पटेल जी ने मुस्करा कर कहा हम आपकी मदद क्यों करें? जम्मू-कश्मीर तो भारत का अंग है ही नहीं। आप कहते हैं कि कश्मीर को अलग देश बनायेगें तो अपना देश बचा लो हम क्यों बचायें। हरि सिंह के जो प्रधानमंत्री थे वो बहुत चालाक थे। उन्होंने कहा कि ये बाद में तय कर लेंगें कि क्या करना है अभी फिलहाल पाकिस्तान के सैनिक से हमें बचा लें। उसके बाद सरदार वल्लभ भाई पटेल जी ने कहा हम तो अपनी सेना भेज देगें और हमारी सेना उन्हें गाजर-मूली के तरह काट भी देगें लेकिन मेरी एक शर्त है कि आपको बिना किसी शर्त के कश्मीर को भारत में विलय कर देगें और ये घोषणा कर देगें कि भारत में हमारा पूरा राज्य विलय होगा और संधि पर दशकत होगा कि ये कश्मीर भारत का हुआ। उसके बाद भारत अपनी सेना भेजेगा। भारत की सेना तो बॉर्डर की रक्षा के लिए है वो आपको कैसे मदद करेगा जब तक कश्मीर भारत का हिस्सा न हो जाता है। उसके बाद हरि सिंह के मंत्री तुरंत अपने राजा के पास गया और सारी बात बताया कि वो मदद नहीं करेगें, जबतक कश्मीर भारत में विलय नहीं होगा । जब कोई रास्ता नहीं बचा तो अंत में राजा ने संधि पर दशकत करने के लिए तैयार हो गये और दशकत करे दिये कि कश्मीर अब भारत का हुआ तो तुरंत मंत्री ने वो कागज लेकर पटेल जी के पास गया और तुरंत सरदार बल्लभ भाई पटेल अपने हजारों सैनिकों तत्काल कश्मीर भेजा वायु सेना भी भेजा। रातों-रात भारतीये सेना ने मोर्चा संभाल लिया और पाकिस्तान की सेना को गाजर-मूली की तरह काटने लगे। हमारी सेना इतनी उत्साहित हो गई कि उन्हें पता ही नहीं चला कब पाकिस्तान का बार्डर कॉस्र कर गये। उसके बाद सैनिकों ने पटेल जी को फोन किया कि हम लाहौर और कराँची के बिल्कुल पास हमें मत रोकियेगा हम जल्द ही उन्हें भी जीत लेगें।
उसी समय भारत से गलती हो गई भारत के प्रधानमंत्री ने ऑल इंडिया रेडियो से ये घोषणा कर दिये कि युद्ध विराम लगाया जाता है और कश्मीर मुद्दा संयुक्त राष्ट के द्वारा हल किया जायेगा कि यह भारत का है या पाकिस्तान का। ये घोषणा पुरे देश-विदेश में हो गई। जबकि हमारे पास हरि सिंह का संधि पर दशकत किया हुआ कागजात था। काई भी बड़ा फैसला प्रधानमंत्री सभी मंत्री के बीच लेता मतलब कैबिनेट में लेकिन उस समय के प्रधानमंत्री इसकी जरूरत नहीं समझे।

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