निर्भयता और सच्चाई – लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की कहानी (A small story)

गुरुकुल में पढ़ते हुए अनेक छात्र अपने कमरों में रहते थे. एक बार उन्हें कंद मूल फ़ल खाने के लिए दिए गये. उन्हें खाकर लगभग सभी छात्रों ने फलों के छिलके कमरों में यत्र-तत्र बिखरा दिए. लगभग सभी छात्रों के कमरे में गंदगी हो गयी.
प्रधानाध्यापक ने जब कमरों में गंदगी देखी तो छात्रों को उलाहना देते हुए सभी छात्रों से अपने अपने कमरे की सफाई करने के लिए कहा. आदेश पाकर लगभग सभी छात्र सफाई के काम में जुट गये. एक छात्र वहीं अपनी ही धुन में खड़ा रहा. उसके मुख मुद्रा से ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसने इस आदेश को सुना ही नही. वह गुरुकुल की इस हलचल और कार्रवाई से बिलकुल बेखबर बना रहा.

प्रधानाध्यापक ने उसे डांटते हुए कहा – ‘क्या तुमने आदेश नहीं सुना?’
उस छात्र ने कहा – ‘जब मैंने छिलकेकमरे में फेके ही नहीं तो क्यों सफाई करूं.’
छात्र की निर्भयता और सच्चाई पर प्रधानाध्यापक मोहित हो गये. जानते हो यह छात्र कौन था यह था लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक. जिसने हमें एक नारा दिया था – ‘स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है’|

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