पवित्र हाथ

गुरु गोविन्द सिंह एक दिन एक सम्पन्न सेठ के घर पर कुछ नवयुवकों को बतला रहे थे कि वे कैसे देश, समाज और मानव जाति के लिए उपयोगी हो सकते हैं. युवक उनसे तरह-तरह के तर्क करके अपने मन में उठ रही शंकाओं को उन्हें बताते जा रहे थे और वे उनकी शंकाओ का समाधान करते जा रहे थे.

गोष्ठी चलते-चलते काफी देर हो गयी. तभी गुरूजी ने पानी पीने की ईच्छा जाहिर की. वे होठों-ही-होठों में मंद-मंद मुस्कुरा कर बोले- ‘कोई जाकर अपने पवित्र हाथों से मेरे लिए एक बड़ा लोटा ठंढा पानी भर कर ले आओ.’

तुरंत उसी सेठ का बड़ा पुत्र, जो कि गोष्ठी में बैठा हुआ था, उठकर अंदर चला गया और शीतल जल से भरा एक गड़वा (जल भरने का लोटा जैसा बर्तन) लेकर तुरंत वापस आकर गिलास में पानी भरने लगा. उसके हाथ से पानी का गिलास लेते हुए गुरु गोविन्द सिंह जी ने उस युवक की हथेली को बहुत पैनी निगाहों से घूरकर देखा. फिर बड़े ही प्यार से पूछने लगे – ‘बेटा, तुम्हारे हाथ तो वाकई बड़े कोमल हैं. बिलकुल ताजे मक्खन की भी कोमलता को मात कर देने वाले हैं.’ अपने हाथों की गुरूजी के मुख से ऐसी प्रशंसा सुनकर युवक बोला – ‘गुरूजी, मेरे हाथ इसलिए कोमल हैं कि मुझे कभी अपने हाथों से काम नहीं करना पड़ता. मेरे यहाँ एक आवाज पर चार-चार नौकर काम करने दौड़ते हैं. इन हाथों को उल्टा-सीधा काम नहीं करना पड़ता है. इसलिए ये कोमल हैं.

गुरुदेव पानी पीने ही वाले थे, पर युवक के इस कथन पर उनका हाथ ठिठक कर वहीं रुक गया. बड़ी ही गंभीर मुद्रा में उन्होंने युवकों से कहा- ‘मेरे युवक मित्रों! मैं इन अपवित्र हाथों से लाये गये पानी को नहीं पी सकूंगा. तुमलोगों में से कोई अपने पवित्र हाथों वाला पानी लेकर आओ, ताकि मैं अपनी प्यास बुझा सकूँ.’

गुरूजी का यह कहना था कि युवकों की उस सभा में सन्नाटा छा गया. सेठ का पुत्र परेशान हो उठा. उसके साथियों में हलचल मच गयी. तभी एक युवक ने हिम्मत करके पूछा – ‘गुरुदेव, गुस्ताखी की माफ़ी चाहता हूँ. इस सेठ के लड़के के हाथ इतने कोमल हैं. आपने अभी अभी तारीफ भी की, गंदे भी नहीं हैं, फिर अपवित्र कैसे हो गये?’

गुरुदेव मुस्कुराये. बोले- ‘जिस हाथ ने कभी कोई सेवा नहीं की हो, किसी की भलाई नहीं की हो किसी की भलाई का कोई काम करने के लिए जो हाथ आगे ना बढ़ा हो, उसे कोई भी पवित्र कैसे मान सकता है. वह हाथ तो शरीर और समाज पर बोझ है. पवित्रता, सेवा और श्रम करके प्राप्त होती है इसलिए मैनें इस युवक को अपवित्र हाथों वाला कहा है.

शिक्षा – हमें सदा दूसरों की भलाई करते रहना चाहिए. नहीं तो हमारा जीवन व्यर्थ है.

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