पुस्तक से अच्छा कोई मित्र नहीं

यदि कोई आज के इन्सान से पुछे कि सबसे ज्यादा ज्ञान तुम्हें कहाँ से मिलते है? तो बेशक वह बोलेगा कि किताब से मिलता है, किताब हमें एक खुद का पहचान बनाने का मौका देता है। हम अपने पूर्वजों से निःसंदेह भाग्यशाली महसूस करते हैं, क्योंकि हमारे आसपास अनेक तहर की विधा,हुनर घुमती रहती है। जैसे- इलिक्ट्रॉनिक से जुड़े किताब, किसी डिग्री कोर्स की किताबें, प्रेरणादायक किताबें, अपने धर्म की किताबें इत्यादि। माना कि हम किसी किताब में खरे न उतरे हों मगर एक अच्छी सीख जरूर दे देता है, पुस्तक!

हमलोगों का एक समय था कि जब मनुष्य बिल्कुल अशिक्षित था, लोग लिखना पढ़ना नहीं जानते थे। फिर लिखना-पढ़ना आया, किन्तु पुस्तकें तालपत्र, भूर्जपत्र, शिलापट्ट आदि पर लिखी जाती थी। जो व्यक्ति किसी गुरूकुल या विश्वविद्यालय से संबद्ध थे, वही पढ़ने कि सुविधा प्राप्त करते थे। जो बहुत सपन्न थे, वे ही उन हस्तलेखों की प्रतिलिपियाँ कराकर अपने पास रख सकते थे और सुविधा और इच्छा के अनुसार पढ़ सकते थे। किन्तु, मुद्रा और कागज के अविष्कार के कारण हमारे ज्ञान ,विचार और भाव नित्य नई पुस्तकों के रूप में छपकर आने लगे।

उत्तम पुस्तकें इस लोक की चिंतामणि हैं। उसके अघ्ययन से सारी परेशानियों से निकलने का रास्ता बहुत हद तक मिल जाता है, व्याकूल मन को शांति मिलता है। स्वामी शिवानंद न ठीक ही कहा है- पुस्तकों की दुनिया वह वैकुंठलोक है, जहां आनंद-ही-आनंद है। निराशा और हताशा से चूर व्यक्ति के लिए वह परम विश्रामस्थल हैं।

मनुष्य भिन्न-भिन्न प्रकार से आनंद प्राप्त करने का प्रयत्न करता है। कोई नदी तट पर टहलने से आनंद प्राप्त करता है, तो कोई पर्वतीय प्रदेशों की सैर कर आनंद प्राप्त करता है। किसी का रात भर शिकार करने में मजा आता है, तो किसी को ताश खेलने में आनंद प्राप्त होता है, किसी को गप लड़ाना में,तो किसी को क्लब में समय काटने में, किसी को सिनेमा देखने में आता है। किन्तु, अध्ययन का आनंद सभी प्रकार के आनंदों से बिल्कुल अलग है, इसमें न तो बहुत अधिक पैसे की जरूरत है, न अधिक सामग्री जुटाने की। इसमें न तो स्वास्थ्य का क्षय है, न दूसरों के ऊपर निर्भरता का प्रश्न। शिकार के आनंद में तो हत्या की जाती है, जीवन बराबर जोखिम में रहता है, किन्तु अध्ययन का आनंद बिल्कुल निरामिष,निरापद आनंद है।

अच्छे-से-अच्छे मित्र दगा दे जाते हैं। उन्हें चाहकर भी हम मनोनुकूल घड़ियों में साथ नहीं रख सकते। कभी ऐसा भी होता है कि हम अपने पकाऊ मित्रों से पीछा छुड़ाना चाहते हैं, किन्तु उन्हें बुरा न लग जाए, इसलिए कुछ बोल नहीं सकते। परन्तु पुस्तकें ऐसा मित्र है, जिन्हें हम जब चाहें साथ रखें, जब चाहें छोड़ दें। वे कभी बुरा नहीं मानतीं। महात्मा गाँधी ने ठीक ही कहें हैं-‘‘ अच्छी पुस्तकों के पास होने पर हमें अपने भले मित्रों के साथ न रहने की कमी नहीं खटकती।’’

रूची,शिक्षा और उम्र के अनुसार भिन्न प्रकार की पुस्तकें भिन्न प्रकार के लोगों को आनंद प्रदान करती है। बुद्धिमान व्यक्तियों के लिए गंभीर पुस्तकें आनंद से भरी होती है। जहाँ दूसरों के लिए गणित की पुस्तकें पर्वत पर चढ़ने जैसी कठिन होती है,वहाँ गणितज्ञ के लिए गणित की एक समस्या पूरी मानसिक खुराक दे जाती है। वे जबतक उसके समाधान में जुटे रहते हैं, तब तक उन्हें किसी प्रकार की पीड़ा नहीं सताती। रामनुजम् जब गणित का प्रश्न हल करने में एकाग्र थें, तब उनकी पीठ के घाव का ऑपरेशन कर दिया गया और उन्हें पता तक नहीं चला।

अतः जिसने किताबों-पुस्तकों से दोस्ती कर लिया है, उसे जीवन जीने के लिए किसी दूसरे इंसानों पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा, क्योकि उसके पास दूसरों से ज्यादा विधा,विवेक होगा। जो निरक्षर हैं, अध्ययन से दूर भागनेवाले हैं, वे भला इसपर विश्वास भी कर सकेंगें।

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