भारत की प्रमुख नदियाँ एवं उनका विवरण-bhart ki pramukh nadi

भारत की नदियों को चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

1) हिमालय की नदियाँ- इनमेें हिमालय की नदियाँ शामिल हैं जो बर्फ के पिघलने से प्राप्त जल से बारहों मास प्रवाहित रहती हैं। इनमें से वर्षा ऋतु में पानी बढ़ जाने से प्रायः बाढ़ आ जाती है। इनमें ब्रह्मपुत्र, गंगा, यमुना, घाघरा, गोमती, गंडक, कोसी आदि नदियाँ सम्मिलित हैं।

क) गंगा नदी- इसका उद्गम गोमुखी हिमानी से है जो गंगोत्री के पास समुद्र तल से 5,165 मीटर से अधिक उंचाई पर स्थित है। इस नदी का नाम गंगा तब पड़ता है जब इसके दो नदी शीर्ष अलकनन्दा एवं भगीरथी आकर देव प्रयाग में आकर मिलती है। दक्षिण-पश्चिम दिशा का अनुसरण करते हुए गंगा हरिद्वार के पास पहाड़ों से नीचे उतरती है। यह नदी हरिद्वार से पहले दक्षिण और उसके बाद दक्षिण-पूर्व की ओर प्रवाहित होती है। इलाहाबाद के निकट इसमें यमुना नदी आकर मिल जाती है। इसके संगम के नाम से जाना जाता है। यहाँ से यह पूर्व की ओर अपना यह मार्ग बनाती है तथा आगे चलकर गाजीपुर के निकट इसमें गोमती और बलिया के निकट घाघरा नदी आ मिलती है। पटना के पास पहुंचकर सोन नदी तथा कुछ आगे चलकर गण्डक और कोसी नदियाँ भी इसमें आकर मिल जाती हैं।

फरक्का के बाद गंगा नदी की मुख्य धारा पूर्व एवं दक्षिण-पूर्व की ओर बढ़ती हुई, बंग्लादेश में प्रवेश करती है, यहाँ से पदमा नाम से जाना जाता है। यही से यह कई अलग-अलग धाराओं में बँटकर डेल्टाई मैदान से होती हुई समुद्र की ओर बढ़ती है। भागीरथी- हुगली क्षेत्र के नाम से ख्यात गंगा के इस भाग में प्रायद्वीपीय पठार से आई हुई द्वारिका, अजय, रूपनारायण, हल्दी आदि कई धाराएँ मिलती हैं। बंग्लादेश में चन्दनपुर के पास समुद्र में मिलने से पहले पदमा नदी ब्रह्मपुत्र नदी से मिलती है, जिसे वहाँ यमुना या मेघना कहते हैं। भारत में इसका अपवहन क्षेत्र लगभग 9,51,600 वर्ग किमी है। इसके किनारे हरिद्वार, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, पटना, मुंगेर, मुर्शिदाबाद आदि महत्वपूर्ण नगर स्थित हैं। इसकी कुल लम्बाई 2,510 किमी है।

ख) यमुना नदी- इसका उद्गम स्थान यमुनोत्री हिमखण्ड है जो बन्दर पूँछ की पश्चिम ढाल पर स्थित है। यहाँ से यह नदी दक्षिण-पश्चिम को बहती है। आगे चलकर नागतिब्बा पर्वत श्रेणी को पार कर अपनी सहायक टोंस नदी से मिलती है। देहरादून जिले में कुछ दूरी तय करने के पश्चात शिवालिक श्रेणी को काटती है और मैदान में प्रविष्ट होती है। यह नदी एक वृहत चाप का निर्माण करती है। इलाहाबाद में गंगा से मिलने तक इसकी लम्बाई 1,375 किमी है और इसका अपवाह क्षेत्र 3,59,000 वर्ग किमी है।
चम्बल, केन, बेतवा, सिन्धु आदि इसकी सहायक नदियाँ हैं। भूगर्भशास्त्रियों के मतानुसार यमुना नदी कभी इक्षिण अथवा पश्चिम दिशा में राजस्थान की ओर प्रवाहित होती थी, और तत्कालीन सरस्वती नदी इसकी मुख्य सहायक नदी थी। दिल्ली, मथुरा, आगरा, इटावा आदि नगर इसके किनारे स्थित हैं। इसकी कुल लम्बाई 1,300 किमी है।

ग) घाघरा नदी- इसका उद्गम स्थान भारचाचुंगर हिमनद, राक्षसताल (नेपाल) है नेपाल के बीच से बहती हुई मुख्य हिमालय को पार करने से पूर्व ब्रह्मपुत्र घाटी से दक्षिण की ओर लगभग 160 किमी की लम्बाई में प्रवाहित होती है। यह नदी हिमालय तथा शिवालिक श्रेणियों को पार करते हुए गहरी संकीर्ण घाटी का निर्माण करती है। बहराम घाट के निकट इसमें शारदा की सहायक चौकी नदी आ मिलती हैं। यहाँ से यह पूर्व की ओर प्रवाहित होती है तथा गोंडा, बाराबंकी और फैलाबाद जिलों की सीमा निर्धारित करती है। गोरखपुर जिले के बरहज बाजार के पास इसमें छोटी गण्डक उत्तर की ओर से आ मिलती है। अन्त में बिहार के सारण और उत्तर प्रदेश के बलिया जिले की सीमा पर प्रावाहित होती हुई गंगा से जा मिलती है। इसकी कुल लम्बाई 1,180 किमी व अपवाह क्षेत्र 1,27,500 वर्ग किमी है।घ) गण्डक नदी- इस नदी को नेपाल में शलिग्रामी तथा मैदान में नारायणी नामों से पुकारा जाता है। यह नदी अपने साथ गोल घिसी हुई बट्टियों को साथ लाती है जिन्हें सालिग्राम की संज्ञा दी जाती है। यह नदी नेपाल से निकलकर पहले दक्षिण-पश्चिम की ओर बहती है। पुनः आगे चलकर दक्षिण-पूर्व की ओर प्रवाहित होती है। यह उत्तर प्रदेश और बिहार को पृथक करती है तथा आगे चलकर पटना में गंगा की सहायक नदी बन जाती है। ग्रीष्मकाल में हिमाच्छादित स्थान से निकलने के कारण इसमें जल की मात्रा बढ़ जाती है और वर्षाकाल में कभी-कभी भयंकर बाढ़ भी आती है इसकी कुल लम्बाई 425 किमी है व अपवाह क्षेत्र 4,58,000 वर्ग किमी है।

ड़) गोमती नदी- पीलीभीत जिले से समुद्रतल से 200 मीटर की ऊँचाई से निकलकर यह नदी गंगा, घाघरा, दोआब के मध्यवर्ती भाग से उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पश्चिम की ओर बहने वाली एक मैदानी नदी है। खीरी जिले में अपने प्रारम्भिक प्रवाह मार्ग में यह एक छोटी नदी बहती है। सीतापुर जिले में इसमें कथना और सरायाँ दो छोटी नदियाँ इसके बाएँ किनारे पर आकर मिलती है। हरदोई और सीतापुर जिलों की सीमा बनाती हुई बाराबंकी, सुल्तानपुर, जौनपुर जिलों में बहती हुई गाजीपुर में गंगा में मिल जाती है। लखनऊ इसके किनारे स्थित है।

च) कोसी नदी- इसका प्रारम्भिक प्रवाह सात धाराओं-मिलाच्ची भोटिया, कोसी, टाम्बा कोसी, लिक्खू, दुग्ध कोसी, अरूण एवं तम्बुर से मिलकर होता है। इन धाराओं को संयुक्त रूप से कोसी नदी कहते हैं। इनमें अरूण नदी को तिब्बत में पंगनू कहते हैं। अरूण नदी गोसायँथान पर्वत के उत्तर से निकलकर सांपू के दक्षिण में दक्षिण-पश्चिम की ओर 320 किमी तक बहाती है। आगे चलकर यारू नामक नदी इसमें मिलती है। एवरेस्ट और कंचनजंगा पर्वतों के मध्य प्रवाहित हुई आगे बढ़ती है। यहाँ पर ऊँचें हिमनदों से निकलने वाली नदियाँ इसमें मिलती हैं। मुख्य हिमालय पार करने के पश्चात इसमें सुन कोसी पश्चिम की ओर से आ मिलती है। भोटिया कोसी, थागलाँग के पास से निकलकर मुख्य हिमालय में एक प्रदरी का निर्माण कर कोसी नदी में मिल जाती है। आम्बा कोसी, लिक्खू कोसी और दूग्धा कोसी नदियों का उद्रम गौरी शंकर शिखर के दक्षिण में है। कोसी नदी छतरा नामक स्थान पर मैदानी भाग में प्रवेश कर एक वृहत् कछारी पंख का निर्माण करती है। यह नदी निरन्तर अपना मार्ग बदलती रहती है। 200 वर्ष पूर्व यह बिहार के पूर्णियाँ जिले में बहती थी, किन्तु अब 160 किमी पश्चिम की ओर हट गई है। पहले इसका प्रवाह गंगा से संगम मनिहारी के पास था, जो अब कारागोला के दक्षिण-पश्चिम में है। इसकी कुल लम्बाई 730 किमी है। इसका अपवाह क्षेत्र भारत में 21,500 वर्ग किमी है।

छ) ब्रह्मपुत्र नदी- इसका उद्गम स्थान तिब्बत में हिमालय पर्वत की कैलाश श्रेणी में 5,150 मीटर की ऊँचाई पर स्थित एक हिमानी है। दक्षिण तिब्बत में लगभग 1,120 किमी तक हिमालय की मुख्य श्रेणी के समानान्तर साँगपो के नाम से प्रवाहित होती है। अनेक प्रतापों को जन्म देती हुई ऊँचे-ऊँचे शैलों पर सर्पाकार मार्ग बनाती हुई असम की घाटी में प्रवेश करती है। यहाँ से यह ब्रह्मपुत्र नदी के नाम से जानी जाती है। इस प्रकार यह नदी गारा, खासी और जयन्तिया की पहाड़ियों के समीप से प्रवाहित होती हुई बंगाल की समतल भूमि में प्रवेश करती है। लगभग 240 किमी की लम्बी यात्रा करके गोआलन्दों के समीप गंगा की सहायक नदी बन जाती है। यहाँ पर इसे ‘पदमा’ के नाम से जाना जाता है। तिस्ता, सुरूमा और मेघना इसकी सहायक नदियाँ है। गोहाटी, डिब्रूगढ़ और सेकोवाघाट नगर इसके किनारे स्थित है इसकी कुल लम्बाई 2,900 किमी है व अपवाह क्षेत्र 3,40,000 वर्ग किमी हैं।

2) प्रायद्वीपीय नदियाँ- प्रायद्वीपीय की नदियों में सामान्यतया वर्षा का पानी रहता है। इसलिए इनमें पानी की मात्रा घटती-बढ़ती रहती है। इनमें चम्बल, बेतवा, सोन, गोदावरी, कृष्णा, महानदी, नर्मदा, ताप्ती आदि शामिल हैं।
क) चम्बल नदी- यह नदी मध्य प्रदेश में मऊ के निकट जनापाव (616 मीटर ऊँची) पहाड़ी से निकलती है, जो उत्तर की दिशा को अपना मार्ग बनाती है। यह उत्तर-पूर्व की ओर मघ्य प्रदेश, के धार, उज्जैन, रतलाम , मंदसौर जिले से बहती हुई राजस्थान के कोटा, बूँदी जिलों से बहकर राजस्थान और मध्यप्रदेश की सीमा निर्धारित करती हुई उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश की सीमा बनाती है और अन्त में इटावा जिले में यमुना नदी में मिल जाती हैै। इसमें काली सिन्धु, पार्वती और बनारस नदियाँ मिलती हैं। इस नदी पर गाँधी सागर, राणा प्रताप सागर और जवाहर सागर बाँधा तथा विधुत शक्तिगृह बनाए गए हैं। यह अपनी कन्दराओं के लिए विख्यात है। कहीं-कहीं पर इसकी कन्दराओं की गहराई 30 मीटर तक हैं। इसकी कुल लम्बाई 966 किमी है।

ख) बेतवा नदी- इसका उद्गम स्थान रायसेन जिले में कुमरा गाँव के निकट विंध्याचल पर्वत है।उत्तर की ओर विदिशा, गुना जिलों में बहती हुई उत्तर प्रदेश के झाँसी जिले को पार करती हुई टीकमगढ़ जिले की उत्तर-पश्चिमी सीमा के पास से गुजरती है। हमीरपुर (उत्तर प्रदेश) के निकट यमुना से मिल जाती है। इसकी कुल लम्बाई 480 किमी है।

ग) नर्मदा नदी- यह विंध्याचल पर्वत श्रेणियों के अमरकंटक (1,057 मी0 की ऊँचाई) से निकलकर एक संकरी गहरी और सीधी घाटी में सतपुड़ा और विंध्याचल से मध्य बहती हुई जबलपुर (मध्यप्रदेश) के निकट भेड़ाघाट की संगमरमर की चट्टानों में कपिलधरा (धुआँधार) प्रपात का निर्माण करती है। यहाँ 23 मी0 की ऊँचाई से जल गिरता है। इसे गंगा के सामान पवित्र नदी मानी जाती है। इसके किनारे कई तीर्थ स्थान हैं। मण्डला,जलबपुर,होशंगाबाद,खण्डवा तथा खरगोन जिले में बहती हुई गुजरात के भरूव जिले में प्रवेश करती हुई खम्भात की खाड़ी में जाकर गिरती है। इसकी कुल लम्बाई 1,290किमी (म0प्र0 में 1,077 किमी है) इसका अपवाह क्षेत्र 93,180 वर्ग किमी है।

घ) ताप्ती नदी- यह नदी मध्य प्रदेश के बैतुल जिले के मुल्ताई (भूतताप्ती) नगर के निकट से सतपुड़ा पर्वत के दक्षिण में 762 मीटर की ऊँचाई से निकलती है जो पूर्व से पश्चिमी नर्मदा के सातान्तर बहने के पश्चात सूरत के निकट खम्भात की खाड़ी में जा गिरती है। इसकी कुल लम्बाई 724 किमी है। इसका अपवाह क्षेत्र 64,750 वर्ग किमी है।

ड़) सोन नदी- यह नदी विंध्याचल पर्वत की अमरटांक पहाड़ियों से नर्मदा के उद्गम के पास से निकलती हुई रीवा और सीधी जिलों से बहती हुई पटना(बिहार) के निकट गंगा नदी में मिलती है। इसकी कुल लम्बाई 780 किमी है व अपवाह क्षेत्र 19,900 वर्ग किमी है।

च) महानदी- सिंचाई की दृष्टि से उपयोगी महानदी मघ्यप्रदेश के रायपुर जिले में सिहावा के निकट 42 मीटर की ऊँचाई से निकलती है। अधिकांशतः मध्यप्रदेश के बाहर बहती हुई 890 किमी की दूरी तय करने के उपरान्त कटक के पास बंगाल की खाड़ी में गिरती है।

छ) गोदावरी नदी- इसका उद्गम स्थान महाराष् राज्य के नासिक जिले के दक्षिण-पश्चिम में एक छोटी-सी पहाड़ी पर स्थित है। यह नदी बील झील में से होकर बहती हुई महाराष् पठार और बाद में आन्ध्र प्रदेश में तेलंगाना पठार के पूर्व से होती हुई दक्षिण-पूर्व की ओर प्रवाहित होती है। पोलावरम् के पास पूर्वी घाट को पारकर गोदावरी तक गहरी प्रदारी का निर्माण करती हुई बंगाल की खाड़ी में समुद्र में मिलने से पूर्व कई धाराओं मेें विभक्त हो जाती है और एक विस्तृत डेल्टाई प्रदेश का निर्माण करती है। गोदावरी नदी का अपवाह क्षेत्र 3,13,389 वर्ग किमी हैं प्रवरा, पुराना, मवप्रा, पैनगंगा, वैनगंगा, वर्धा, प्रवहिता, इन्द्रावती मानेर तथा सबासी इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ है। नासिक इसी नदी के किनारे पर ही स्थित है। इस नदी की लम्बाई 1,450 किमी हैं।

ज) कृष्णा नदी- इस नदी की उतपत्ति निकट एक झरने से होती है। यहाँ से निकलकर सांगली स्थान के दक्षिण-पूर्व में मैसूर राज्य में बहती हुई राज्य की पूर्वी सीमा पर भीमा नदी के संगम के पश्चात् आन्ध्र प्रदेश में प्रवेश में प्रवेश करती है। यहाँ से यह नदी करनूल, महबूब नगर, नलगोण्डा और गुण्टूर जिलों की सीमा बनाती हुई बहती है। तुंगभद्रा के संगम के बाद लगभग 290 किमी लम्बी पहाड़ियाँ युक्त संकीर्ण मार्ग से गुजरती है। बंगाल की खाड़ी में मिलने से पूर्व विजयवाड़ा के समीप कई शाखाओं में विभक्त हो जाती है और एक विशाल डेल्आई प्रदेश का निर्माण करती है। कोयना, धारप्रभा, मालाप्राभा, भीमा, तुगंभद्रा, मुसी, मुनेर आदि नदियों को मिलाकर इसका कुल अपवहन क्षेत्र 2,58,948 वर्ग किमी है। इसकी कुल लम्बाई 1,230 किमी है। विजयवाड़ा नगर इसी नदी के किनारे स्थित है।

झ) कावेरी नदी- दक्षिण भारत की गंगा के नाम से सम्बोधित की जाने वाली कावेरी नदी की उद्गम स्थान बहगिरी पहाड़ियों में कुर्ग है। कर्नाटक राज्य में इस पर अनेक बाँध बनाये गये हैं, जिनसे सिंचाई की जाती है। कर्नाटक राज्य मेें इस नदी के अपनी धारा में शिवसमुद्रम और रंगपट्टम नामक दो द्विप छोड़ रखे हैं, जो अति पवित्र माने जाते है। शिव समुद्रम के निकट ही यह नदी लगभग 100 मीटर की ऊँचाई से नीचे उतरती है और एक अति सुन्दर प्रपात को जन्म देती है, जिससे विद्युत तैयार की जाती है। तंजौर जिला इसके डेल्टाई प्रद्रेश में ही स्थित है जो अति उतरती है। जिसे दक्षिण के बगीचे के नाम पुकारा जाता है। आजकल इस नदी के जल-बँटवारें को लेकर तमिलनाडु, कर्नाटक और पांडिचेरी राज्यों के मघ्य विवाद है, श्री रंगपट्टम नगर इसी नदी पर स्थित है। इसे दक्षिण गंगा भी कहते हैं। इसकी कुल लम्बाई 760 किमी है व अपवाह क्षेत्र 80,280 वर्ग किमी है।

3) तटीय नदियाँ- तटीय नदियाँ मुख्यतया पूर्वीतट की ओर हैं, जो कम लम्बी है। इनमें जल की मात्रा बहुत कम रहती है। इनमें पेन्नर व अन्य छोटी-छोटी नदियाँ शामिल हैं।

क) पेन्नर नदी- कर्नाटक राज्य के बंगलौर जिले से निकलकर आन्ध्र प्रदेश के अनन्तपुर जिले के मध्य एक उत्तर की ओर प्रवाहित होती है और इसके पश्चात यह एक बड़ा मोड़ बनाती हुई पूर्व की ओर बहती हुई वेदी कोण्डा श्रेणी को पार करके बेल्लूर जिले में बंगाल की खाड़ी में गिर जाती है। जयमांगली सेगीलेक, कुन्डेन, चित्रावती, पापग्नि तथा चच्चेरू इसकी मुख्य सहायक नदियाँ है। इसकी कुल लम्बाई 970 किमी है।

4) अंतः स्थलीय नदियाँ- राजस्थान में ऐसी कुछ नदियाँ है जिनमें बहुत कम जल होती है। ये नदियाँ रेंत में ही लुप्त हो जाती है। लूनी नदी इसका मुख्य उदाहरण है। अन्य नदियों में घग्घर, कांतली, लावी और काकनी है।

क) लूनी नदी-  यह नदी अजमेर के नाग पहाड़ (अरवाली पर्वत) से निकलकर जोधपुर सम्भाग में बहती हुई गुजरात में प्रवेश कर कच्छ की खाड़ी में गिरती है बाड़ी, मिठरी और सूकड़ी इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ है। इसकी लम्बाई 330 किमी है।

ख) घग्घर नदी-  यह कालिका के पास हिमालय से निकलकर गंगानगर (राजस्थान) में बहती हुई मरूस्थलीय भाग में लुप्त हो जाती है।

ग) कान्तली नदी-  यह मौसमी नदी सीकर जिले की खण्डेला पहाडियों से निकलकर तोरावाटी उच्चभूमि पर प्रवाहित होती हुई उत्तर में सीकर एवं झुन्झुनू जिलों में लगभग 100 किमी बहने के उपरान्तर चुरू जिले की सीमा के निकट लुप्त हो जाती है।

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