भौतिक सुविधाओं के लिए प्रकृति का नाश क्यों?

सबसे जयादा कार्बन का उत्सर्जन करने वाला देश चीन(२७%) है, उसके बाद अमेरिका(१७%), (२७% + १७% = ४४%)। यानी, कुल प्रदुषण का लगभग आधा केवल दो देश कर रहे हैं। ये बड़े ही शर्म की बात है कि ये दोनों देश प्रकृति का नाश कर अपने को विकसित करने में लगे हुए हैं। और जिसे ये विकास का नाम दे रहें हैं वो केवल भौतिक सुविधाएँ की प्राप्ति है, और भौतिक सुविधाएँ की प्राप्ति जीवन का लक्ष्य कभी नहीं हो सकती है, क्योंकि जीवन तो क्षणिक है। भारत का भी कार्बन उत्सर्जन में योगदान ५% है जो कि कम नहीं है और भारत जैसे देश के लिए, जो कि सदियों से प्रकृति का पूजा करता है, शर्मनाक है।

आश्चर्य की बात यह है कि सभी तथाकथित अविकसित देश (भारत सहित) अमेरिका जैसे देश का अनुशरण कर रहे हैं और प्लास्टिक जैसे अन्य हानिकारक पदार्थ का उपयोग कर प्रकृति को प्रदूषित करने में लगे हुए हैं। भारत अपने वेद-शास्त्र की भाषा छोड़ कर अमेरिका जैसे प्रदुषणकारी और अध्यात्महीन देश के नक़्शे कदम पर चल रहा है और भौतिक सुविधाएँ के पीछे भाग रहा है। प्रकृति को नुक्सान पहुँचा कर हमें कभी भी भौतिक सुख की लालसा नहीं करनी चाहिए।

अध्यात्म और साधना के पथ पर चल कर ब्रह्म्प्राप्ति ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए।

प्राचीन काल में भारत के योद्धा मंत्र उच्चारण से ही तीर एवं अन्य अस्त्र-शस्त्र चलाया करते थे। पूर्वकाल में भारत का विज्ञान बहुत ही आधुनिक एवं प्रकृति के अनुकूल था। पुष्पकविमान हिन्दू पौराणिक महाकाव्य रामायण में वर्णित वायु-वाहन था। इसमें लंका के राजा रावण आवागमन किया करता था। इसका आकार आवश्यकतानुसार छोटा या बड़ा किया जा सकता था। कहीं भी आवागमन हेतु इसे अपने मन की गति से असीमित चलाया जा सकता था। ऋगवेद में लगभग २०० से अधिक बार विमानों के बारे में उल्लेख दिया है। इसमें कई प्रकार के विमान जैसे तिमंजिला, त्रिभुज आकार के एवं तीन पहिये वाले, आदि विमानों का उल्लेख है। भारत के लोग भौतिकता से बहुत दूर और अध्यात्म के बहुत करीब थे।

अभिप्राय यह है कि भारत के वेद में जीवन के सभी मूल-भुत सुविधाओ के बारे में बताया गया है, जीवन जीने की सही विधि का वर्णन किया गया है जो कि बिलकुल प्रकृति के अनुकूल है, इससे प्रकृति को कोई हानी नहीं पहुँचती है तो फिर हम क्यों भौतिक सुख-सुविधाओं के लिए प्रकृति का नाश कर रहें हैं?

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