मिटटी के बर्तन में पके भोजन से अपने बीमारी को कैसे भगाए

स्वर्गीय श्री राजीव दीक्षित के रिसर्च प्रेशर कुकर से अच्छा मिट्टी के बरतन में खाना पकाकर खाना हमारे शरीर के लिए ज्यादा लाभदायक है।

मैं एक बार जगरनाथ पूरी गया था, आप भी गये होगें तो मैंने मंदिर के महत्व को पूछा कि भगवान का प्रसाद मतलब वहाँ दाल चावल मिलता है प्रसाद के रूप में तो वे मिट्टी के बरतन में क्यों प्रसाद बनाते है, तो उसने एक ही बात बोले कि मिट्टी पवित्र होती है लेकिन वो जो कुछ नहीं कह पाया महŸव वो मैं कहता हूँ कि मिट्टी न सिर्फ पवित्र होती है बल्कि मिट्टी सबसे ज्यादा वैज्ञानिक होते हैं। हमारा शरीर मिट्टी से बना है, हम जब मरते हैं तो शरीर को जला देते है तो 20 ग्राम मिट्टी में बदल जाता है। इस राख का मैंने रिसर्च कराया है एक प्रयोगशाला में तो उसमे कैल्शियम, आयरण, जिंक, सलफर निकलता है 18 सूक्ष्मपदार्थ निकलते है मरे हुए इंसान के राख से ये सब वही सूक्ष्मपदार्थ है जो निकलते है मिट्टी में है तो पुजारी कहते हैं मिट्टी बरतन पवित्र है, इसलिए मिट्टी बरतन में ही प्रसाद बनाते हैं, भगवान को हम पवित्र वस्तु ही चढ़ाते हैं, वो बहुत ही वैज्ञानिक स्टेटमंेट है सिर्फ अन्तर यही की उसको वे विस्तार में नहीं बता सकते हैं। मैं वो दाल ले आया हूँ और भूवनेश्वर ले गया, (पूरी से भूवनेश्वर) भूवनेश्वर में एक सी0 एस0 आई0 आर0 का एक प्रयोगशाला है, वहाँ लेकर गया और कुछ वैज्ञानिक से बोला ये दाल है तो वे बोले हाँ-हाँ ये पूरी का दाल है, इसका विश्लेषण करना है कि दाल में क्या है? तो उन्होंने कहा कि हमारे पास पूरे औजार नहीं है कि मैं इसका जाँच कर सकूँ , ऐसा करो कि तुम इसे दिल्ली ले जाओ तो मैंने कहा कि दिल्ली लेकर जाऊँगा तो ये खराब नहीं हो जाएगा तो उन्होंने कहा कि नहीं होगा क्योंकि ये मिट्टी में बनी है तो पहली बार मुझे समझ आया कि ये मिट्टी में बनी है तो ये खराब नहीं होगा तो मै दिल्ली लेकर गया, सच में मैं दिल्ली लेकर गया। भूवनेश्वर से दिल्ली पहुँचने में कितने समय लगते हैं आपको तो पता होगा 36 घंटे लगभग लगते है। दिल्ली में दिया और कुछ वैज्ञानिक इस पर रिसर्च किया और गजब का रिजल्ट आया, उन्होंने कहा कि इसमें 100 प्रतिशत सूक्ष्मपोषक तत्व है। तो प्रेशर-कुकर की दाल को रिसर्च करके देखा तो वे बोेले कि इसमें बहुत कम पोशक-तत्व है तो मैंने कहा प्रतिशत में बता दें तो उन्होंने कहा कि 13 प्रतिशत ही इसमें पोशक तत्व हैं 87 प्रतिशत नष्ट हो गये, खाना बनाने के बाद। मैं पूछा कि ये कैसे नष्ट हो गया तो उन्होंने कहा कि जो प्रेशर पड़ा है ऊपर से और इसने दाल को पकने नहीं दिया बल्कि तोड़ दिया पोषक तत्व बिखड़ गया, पकी नहीं है मुलायम हो गई है, हमसब को ऐसा लगता है कि वो पक गये हैं परन्तु वे पके नहीं हैं। पके हुए से मतलब होता है कि जो सूक्ष्मपोषक तत्व कच्चे दाल में शरीर के उपयोग में नहीं आते है उनको आप उपयोगी बना लें उसे अच्छी तरह पकाकर।

उन्होंने कहा कि ये मिट्टी की दाल गुणवत्ता में बहुत ऊपर है, व शर्ते कि प्रेशर-कुकर की मुकाबले। मिट्टी में बने हुए दाल एक बार खा लीजिए तो उसका जो स्वाद है वो आप जिंदगी भर नहीं भूलेगें। इसका मतलब क्या है? भारत में चिकित्सा का और शास्त्र पाक कला का ऐसा विज्ञान विकसित हुआ है जहाँ गुणवत्ता भी बराबर रहेगी और स्वाद भी बराबर रहेगा। मैने गांव-गांव, घूमता रहता हुँ तो पूछना शुरू किया तो बोलते हैं लोग कि ज्यादा नहीं 50-60 साल पहले सब घर में मिट्टी कि हांडी में ही दाल पकाते और खाते थे। उसके बाद मैंने अपनी दादी से पूछा तो वो कहीं की हम तो जिन्दगी भर मिट्टी की बरतन में पकाते थे, तब मुझे समझ में आया कि मेरी दादी को मधुमेह क्यों नहीं हुआ, तब मुझे समझ में आया कि उन्हें घुटनों में दर्द क्यों नहीं हुआ, तब मुझे समझ में आया कि उन्हें मरने के समय तक दाँत सुरक्षित क्यों थे, तब मुझे समझ में आया कि उसके मरने तक उसे चश्मा क्यों नहीं लगा। दादी अपने मरने वक्त तक अपना कपड़ा खुद कैस धो लेती थी। यही कारण कि हमारे शरीर में महत्वपुर्ण सुक्ष्मपोषक तत्व की पूर्ती अगर नियमित रूप से होती रहे तो आपका शरीर ज्यादा दिनों तक बिना किसी दूसरे के मदद से अपना काम आप स्वयं करते रहेगें। मेरी दादी न सिर्फ मिट्टी के बरतन में दाल पकाती थी बल्कि दुध और खीर भी उसी में पकाती थी, दही भी उसी में जमाती थी। अब मुझे समझ में आया कि हजारों साल से क्यों हमारे देश में मिट्टी की बरतन का इस्तमाल हो रहा है। हम भी एल्युमीनियम बना सकते थे, हिन्दुस्तान में एल्युमीनियम के खाद्यान भरे पड़े हैं, कर्नाटक बहुत बड़ा भण्डार, आंध्रप्रदेश में बड़े-बड़े खाद्यान भरे पड़े हैं। हम भी बना सकते थे अगर उसका भण्डार भड़ा पड़ा है, मगर हमें उसकी जरूरत नहीं पड़ी। इसलिए पुरे देश में कुम्हार की एक जमात खड़ी की गई और बोला कि तुम्हे मिट्टी की बरतन ही बनानी है। मतलब तुम से बड़ा विज्ञानिक कौन? अब ये कुम्हार जो इतने बड़े विज्ञानिक हैं इस देश के जो मिट्टी के बरतन बनाकर हजारों सालों से बनाकर दे रहे हैं, हमारे स्वास्थ्य की रक्षा के लिए हमने उसे नीच जाति में बना दिया, सोचो हम कितने मूर्ख हैं। हमने उँचा-नीचा डाल दिया इस देश में इसी ने देश का सत्यानास कर दिया। अगर प्रेशर-कुकर की कम्पनी अगर ऊँचा आदमी है, तो कुम्हार नीचा का कैसे हुआ जो सबसे बड़ा वैज्ञानिक काम कर रहा है, मिट्टी के बर्तन बना-बना कर आपके सूक्ष्मपोषक तत्व बरकरार रखे हुए है, मिट्टी का चुनाव करता है आपको पता है, सभी मिट्टी से बरतन नहीं बनाए जा सकते हैं एक खास तरह की मिट्टी है वही बरतन बनाने में काम आती है। ये काम कुम्हार कई सालों सालों से कर रहें हैं, सबसे मजे की बात ये जब बरतन खत्म होगी मतलब जब इसकी लाइफ पूरी हो जाएगी तो ये बरतन फिर मिट्टी में मिल जाएगी और फिर वही मिट्टी से बरतन बन जाएगी। दुनिया में ऐसी कोई नहीं है, प्रेशर-कुकर के बारे में तो नहीं कह सकते क्योंकि इसे गलाने के लिए आग और प्रदूषण करने की जरूरत पड़ेगी।

आप भी कर लें ये काम प्रेशर-कुकर घर के बाहर और मिट्टी के बरतन या हांडी घर के अन्दर, तो आप कहेगें कि दाल देर से पकेगी, सिद्धांत ही वही है दाल की जो चीज खेत में देर से पकी है वो घर में भी देर से ही पकेगी। आप कहेगें कि मिट्टी की बरतन के बाद दूसरी कोई और धातु तो होना चाहिए जो अनाज के पोषक तत्व को को बनाए रखे, तो दूसरी धातु काँसा का बरतन, तीसरा पीतल का बरतन। अब मैंने काँसा और पीतर के बरतन पर भी काम कर लिया कि अरहर की दाल को काँसें के बरतन में पकायें तो उसमें मात्र तीन प्रतिशत सुक्ष्म पोषक तत्व कम होते हैं और पीतल के बरतन में पकायें तो सात प्रतिशत ही कम होते हैं। प्रेशर-कुकर में अगर बनाए तो सिर्फ सात प्रतिशत बचते हैं, 93 प्रतिशत बर्बाद हो जाता है। आप तय कर लें कि गुणवत्ता चाहिए या कम समय में पकाने वाला बरतन। मतलब भारत के तरफ वापस लौटना पड़ेगा, इण्डिया से। हमलोग अभी हैं इण्डिया में जो बनाया अंग्रेजों ने या बना दिया अमेरिकियों ने, इस इण्डिया से निकलकर भारत की यात्रा करनी पड़ेगी। मैने इसका प्रचार गांवों में किया है तो कुम्हारों की इज्जत बढ़ गई, मेरी उद्धेश्य ये है कि कुम्हारों की इज्जत इतनी बढ़ जाए कि वो पंडितों के बराबर हो जाए। मजे की बात ये है कि कुम्हार लोग बरतन मात्र 80-90 में ही दे रहे हैं और प्रेशर-कुकर आपको 700 में मिलता है और साथ में बिमारियाँ भी देता है। मैं होम्योपैथिक का भी चिकित्सा करता हूँ तो बहुत सारे रोगी का मेरे पास फोन आता है, कोई कहता ये है, कोई कहता है वो है तो मै कहता हूँ कि कोई दवा नहीं दूँगा तो वेलोग कहते हैं फिर बिमारी ठीक कैसे होगा? एक ही काम करो कि मिट्टी के बरतन की दाल खाना शुरू करो, चावल खाना है तो मिट्टी की बरतन का, तो कहने लगे राजीव भाई ये कौन करेगा तो मैंने कहा आपकी पत्नी या आप करोगे, अगर लाइफ चाहिए तो आप झख मार के करोगे, नहीं तो अमेरिका जाओ, कनाडा जाओ और लाखों रूपया खर्च करके झख मार के वापस आओ। मेरे पास मधुमेह का सिरियस मरीज हैं जिसका शुगर 480 पहुँच गया है वो आठ से नौ महीना हो गया वे लगातार मिट्टी के बरतन में दाल, खीर, चावल, रोटी खा रहे हैं। अब उसका शुगर टेस्ट किया है 480 यूनिट वाला 180 युनिट हो चुका हैं, बिना दवाई का। मैंने रोगी को सादा दवाई दे दिया ताकि उसे लगे कि वो दवाई खा रहा है जबकी वो काई दवाई नहीं खा रहा है, वो सिर्फ मिट्टी में बने खाना खा रहा है।

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