रक्षाबंधन

                                                         रक्षाबंधन क्या है ? यह कब और क्यों मनाया जाता है ?
रक्षाबंधन का त्योहार हर साल श्रावण पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। यह पर्व भाई-बहन के पवित्र रिश्ता को दर्शाता है, जिसे हम रक्षासूत्र भी कहते हैं। ये एक रक्षा करने का रिश्ता है, जहाँ बहन अपने भाई के कलाई पर रक्षासूत्र बाँधती है जो हर तरह के आने वाली बाधा से भाई को दूर रखती है। भाई के साथ कोई अनहोनी न हो इसके लिए रक्षासूत्र मतलब राखी को बाँधती है, जो हर आसपास के नाकारात्मक शक्ति को दूर रखती है। भाई भी इसके बदले अपनी बहन को यह वचन देता है कि उसकी रक्षा करेगा और उसके हर छोटी-बड़ी समस्या में साथ देगा। इस रेशमी धागे में इतनी शक्ति होती है, कि जितनी लोहे की जंजीरों में भी नहीं। लौहश्रृंखला को झटक देना आसान है, किन्तु जो भी इस भाई-बहन के इस प्रेमबंधन में बँध गया, उसके लिए इसे तोड़कर निकल जाना अंसभव हैं।

भारत जैसे प्राचीन देश जहाँ परम्परा को निभाई जाती है, वहाँ रक्षासूत्र में बाँधनी की प्रथा काफी पुरानी है और यह श्रवण पुर्णिमा का बहुत बड़ा त्योहार है। प्रत्येक पूर्णिमा किसी न किसी उत्सव के लिए समर्पित है। सबसे महत्वपूर्ण है कि आप जीवन का उत्सव मनाये। सभी भाईयों और बहनों को एक दूसरे के प्रति प्रेम और कर्तव्य का पालन और रक्षा का दायित्व लेते हुए ढेर सारी शुभकामना के साथ रक्षाबंधन का त्योहार मनाना चाहिए।

रक्षाबंधन के पीछे बहुत सी अनोखी और रोंमाचक कहानियाँ है। महाभारत काल में कृष्ण को थोड़ा-सा चोट लग जाती है और खून बहनें लगती है, तब उसी समय द्रोपति ने अपने पल्लू से कपड़ा का टुकड़ा फाड़ कर कृष्ण के चोट वाली जगह पर बाँध देती तब कृष्ण बोलते है, इसका उपकार मै कभी चुका दुगाँ। कुछ समय गुजड़ जाने के बाद जब पॉण्डव जुएँ में सब हार जाता है और जब द्रोपति का जब चीर हरण होता है तब द्रोपति कृष्ण को याद कर मदद माँगती है, तब उसी समय अदृश्य रूप से कृष्ण जी उसकी लाज को बचाते है।

दुसरी कथा, कहते है कि एक बार देवताओं और दानवों में बारह वर्ष तक भयानक युद्ध हुआ, जिसमें देवता पराजित हो गयें। इंन्द्रदेव प्रराजित होकर अन्य देवताओं केे साथ अमरावली चले गये। दैत्यराज ने जब तीनों लोकों पर कब्जा कर लिया तो उसने यज्ञों, वेदों, आहुतियों व मंत्रों पर सख्ती से पाबंदी लगा दी जिससे देवताओं की शक्ति क्षीण होेने लगी। ऐसे में इंद्र ने गुरू बृहस्पति को, जो देवताओं के गुरू थे, बुलाया और उनसे दानवों पर विजय पाने को उपाय पूछा। तब देवगुरू बृहस्पति जी ने उन्हें रक्षाविधान करने को कहा। ब्राह्यण शुक्ल पूर्णिमा के दिन इंद्राणी ने पूरे विधि- विधानपूर्वक मंत्रोच्चारण के साथ रक्षासूत्र तैयार किया। अगले दिन इंद्रदेव ने गुरूदेव से रक्षा विधान बंधवाया व इस मंत्र के उच्चारण के साथ रक्षा विधान समपन्न हुआ और वे जीत गये।
                                                                ” येन बद्धो बलि: राजा दानवेन्द्रो महाबल:।

                                                                   तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥”

तीसरी कथा के अनुसार राजा बलि को दिए वचन के अनुसार भगवान विष्णु को विष्णुलोक छोड़ कर राजा बलि की रक्षा के लिए उनके राज्य में जाना पड़ा। ऐसे में देवी लक्ष्मी एक ब्राह्यणी का रूप धारण कर राजा के पास गई और उसकी कलाई पर पवित्र रक्षासूत्र बांधकर भाई मानते हुए रक्षा का वचन ले लिया। तब देवी लक्ष्मी अपने असली रूप में प्रकट हुई और अपने पति विष्णु जी की बैकुण्ठ वापसी का वचन लेकर उन्हें वापस विष्णलोक ले आई।

सामान्यतः ये राखी रेशमी धागों से बनी होती है, परन्तु आज के फैशन के दौड़ में ये बहूत तरह में बंट चुकी है- पूर्ण रेशमी धागे, चाइनीज राखी, सूती धागे, चाँदी से बना राखी, सोने से बने राखी इत्यादि। ये सब राखी का काम एक ही है, मगर शौक अलग-अलग है। आज के राखी बाजार में बिकती है उसे खरीद कर छोटे-बडे दामों में लाकर बांध दिया जाता है और बदले में पैसा और बड़ा उपहार का माँग किया जाता हैं। जबकी राखी को मंदिरों में चढ़ा कर उसे मंत्रों से अभिमंत्रित कर बांधना चाहिए और बदले में हर संकटों से दूर रहें, इसकी प्रार्थना करनी चाहिए।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *