विद्यार्थी और अनुशासन (Student and Discipline)

अनुशासन का शाब्दिक अर्थ शासन के पीछे चलना हैं, अर्थात् गुरूजनों,माता पिता,और अभिवावक के बताये गये रास्ते के नियमानुसार चलना चाहिए। उनकी आज्ञाओं का पालन करने को ही अनुशासन कहा जाता है। अनुशासन विद्यार्थी -जीवन का प्राण है। अनुशासनहीन विद्यार्थी न तो देश का सभ्य नागरिक बन सकता है और न अपने जीवन में ही सफल हो सकता है, विद्यार्थी जीवन के लिए यह सफलता की एकमात्र कुंजी है।

आज विद्यार्थियों की अनुशासनहीनता चरम सीमा पर हैं-क्या घर,क्या स्कूल,क्या बाजार,क्या मेले,। आज के विद्यार्थी घर में माता-पिता की आज्ञा नहीें मानते,उनके आदर नहीं करते। उनके बताए हुए मार्ग पर नहीं चलते। परिणाम यह होता है कि वे गलत संगत में पड़ जाते हैं।

अनुशासनहीनता का मुख्य कारण माता-पिता की ढ़िलाई है। माता पिता के संस्कार ही बच्चे पर पड़ते है। बच्चे को प्रथम ज्ञान उसके अपने घर से ही मिलती है । वह पहले अपने घर पर ही शिक्षा प्राप्त करता है ,उसके बाद ही वह  स्कूल और कॉलेज जाता है। उसके संस्कार घर से ही खराब हो जाते है। पहले तो प्यार के कारण माता-पिता कुछ कहते नहीं। वह जहाँ चाहे बैठे और जहां चाहे खेले,जो मन में आये वो करे; पर जब हाथी के दाँत निकल जाते हैं तब उन्हें चिन्ता होती है। दूसरा कारण आज की अपनी शिक्षा प्रणाली हैं इसमें नैतिक और सामाजिक शिक्षा को कोई स्थान नहीं दिया गया है।

देश में अनुशासन की पुनः स्थापना करने के लिए यह आवश्यक है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में नैतिक और चारित्रिक शिक्षा पर विशेष बल दिया जाय,जिससे छात्र को अपने  कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य का ज्ञान हो जाय। हमारी शिक्षा-प्रणाली में कक्षा एक से लेकर एम0 ए0 तक के विद्यार्थियों को संस्कार की शिक्षा नहीं पढ़ाया जाता है। सिवाय इसके कि वे कबीर और रहीम के नीतिपरक दोहे पढ़ लें,वह भी मात्र परिक्षा में अर्थ लिखने की दृष्टि से। दूसरी बात यह है कि शारीरिक दंड का अधिकार होना चाहिए, क्योंकि बालक तो माता-पिता की तरह गुरू के भी भय से भी अपने  कर्त्तव्य का पालन करता है।

तीसरी बात यह है कि माता-पिता को बचपन से ही अपने बच्चों के कार्यों पर कड़ी दृष्टि रखनी चाहिए,क्योंकि गुण और दोष साथ ही उत्पन्न होते है। हमारी शिक्षा-प्रणाली में भी परिवर्तन की आवश्यकता है। कहने का तात्पर्य यह है कि देश के विद्यार्थियों में अनुशासन स्थापित किए बिना देश का कल्याण नहीं हो सकता। आज का विद्यार्थी कल का सभ्य नागरिक हो इसके लिए हमें अपने शिक्षा-व्यवस्था में आमूल परिवर्तन करने होगें। देश के नागरिकों का निर्माण अभिवावक और अध्यापक के हाथों में है। उन्हें भी अपने  कर्त्तव्य का पालन करना होगा।

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