सफलता का रहस्य

ऐसा कौन मनुष्य होगा जो ये न चाहे कि सफलता उसकी कदम चूमें। मनुष्य के मन से एक ही आवाज आती है- सफलता। उसके रोम-रोम में एक ही धुन बजती है वो है- सफलता। किन्तु क्या केवल सफलता-सफलता के उच्चारण मात्र से जीवन में सफलता मिल जाती है? कदापि नहीं। तब व्यक्ति सफलता का रहस्य को जानना चाहता है; वह ऐसी कोई जादुई कुँजी पा लेना चाहता है, जिससे उसे सफलता का कुबेरकोष उसे प्राप्त हो जाए। वह अलादीन का चिराग पा लेना चाहता है, जिससे सफलता की रानी इठलाती हुई उसके पास चली आए।

सफलता का राज जानने के लिए मानव के मन-प्राण बेचैन बने रहते हैं, किंतु यह जान लेना जरूरी है कि सफलता प्राप्ति की कोई एक स्वर्णिम कुँजी नहीं है, जादुई चाबी नहीं है; सफलता के लिए कुछ सुत्र अवश्य हैं। यदि इन सुत्रों पर पूरी आत्मविश्वास के साथ अमल किया जाए।

सफलता का पहला सूत्र है अपनी रूचि और प्रवृति, अपनी क्षमता और शक्ति के अनुसार अपना लक्ष्य निर्धारित करना। लक्ष्य का पता हो जाने के बाद उसपर निरंतर अडिग/डटे रहना आवश्यक है। कामयाब इंसानों का कहना है- लक्ष्य का हमेशा अपने सामने रखो और सतत प्रयास में लगे रहो- सफलता का यही रहस्य है। उन लक्ष्य पर निष्ठा और एकाग्रता आवश्यक है। अपने लक्ष्य को सोते-जागते, आगे-पीछे हमेशा अपने साथ रखीये और उसपर चिंतन करते रहिये, तो समझिए सफलता की आधी मंजिल मिल गई, उसकी आधी दूरी तय हो गई। लक्ष्यवेद में अर्जुनदृष्टि होनी चाहिए- सिर्फ मछली की आँख ही दिखनी चाहिए।

(निम्न श्रेणी के लोग असफलता के भय से किसी काम को प्रारंभ ही नहीं करते, मध्यम श्रेणी के लोग प्रारंभ करके विध्न आने पर रूक जाते हैं, किन्तु उत्तमजन बार-बार रूकावट आने पर भी कार्य आरंभ करके बिना पूरा किए नहीं छोड़ते हैं।)

साहस के साथ आत्मविश्वास का रहना भी जरूरी है, आत्मविश्वास को ही सफलता का प्रथम रहस्य माना है। यदि मनुष्य कार्य करे, किन्तु उसका दिल चुहे का हो, वह बराबर भयभीत होता रहे, तो सफलता में रूकावट आ जाती है। यदि थोड़ी-सी असफलता हुई, पराजय का एक कुहासा छाया और बस हम काँपने लगे; आस्था डिगने लगी, तो सफलता दूर भाग जाएगी। शायद भाग्य में सफलता है ही नहीं, शायद हमारे अनुकूल समय है ही नहीं, शायद सफलता की रेखा हमारे हाथों कि लकीरों में है ही नहीं- ऐसा सोचना ठीक नहीं। मनुष्य तो स्वयं अपना भाग्यविधाता है। बाहरी शक्ति उसे पराजित नहीं कर सकतीं। ( नेपोलियन की यह उक्ति हर वक्त याद करनी चाहिए- मैं आया, मैनें देखा और मैंने जीत लिया। )

सलफता के और भी कई सूत्र. हो सकते हैं- सुन्दर स्वास्थ्य, ईमानदारी, दुसरों का विश्वास अर्जन, व्यवहारकुशलता। लक्ष्य निश्चित होने पर भी वही व्यक्ति साधनारत रह सकता है, कठोर व्रत कर सकता है, जो पुर्णतः स्वस्थ हो। विजयी होने के लिए पत्थर-सी मांसपेशियाँ चाहिए, फौलाद-सी भुजाएँ चाहिए। जो व्यक्ति दिन रात रोगपीड़ित हो, रोज पेट दर्द और सरदर्द से परेशान हो, उसकी सफलता संदिग्ध ही है। अतः सफलता के लिए उत्तम स्वास्थ्य भी बहुत जरूरी है।

ईमानदारी सबसे अच्छी नीति है। ईमानदार और व्यवहारकुशल व्यक्ति मिट्टी से सोना बना लेता है। ईमानदारी सबसे बड़ी सम्पत्ति है। इसके सामने सोना-चाँदी की थैली बेकार है। उसी प्रकार व्यवहार-कुशलता मनुष्य को आदर्श के नीलगगन से मिट्टी की ठोस भूमि पर ले आती है। व्यवहार में कुशल और ईमानदारी में कुशल व्यक्ति दुसरों के दिलो में राज करते है और इससे भी जीवन में सफलता-प्राप्ति सहज हो जाती है। इसमें कोई संदेह नहीं हैं।

सफलता से जुड़े कुछ विचार या शक्तिवर्धन बातें-

1)   दुसरों की गल्तियों से सीखों, अपने ही ऊपर प्रयोग करके सीखने को तुम्हारी आयु कम पड़ेगी।
2)  जो व्यक्ति, शक्ति न होते हुए भी हार नहीं मानता, उसको दुनियां की कोई भी ताकत परास्त नहीं कर सकती।
3)  कभी भी अपने रहस्यों को किसी से भी सांझा न करें अर्थात् किसी को भी न बतायें, यह प्रवृति आपको बर्बाद कर देगी। यह सबसे बड़ा         गुरूमंत्र है।
4)  किसी भी व्यक्ति को बहुत ईमानदार और सीधा नहीं होना चाहिए, सीधे वृक्ष और व्यक्ति पहले काटे जाते हैं।
5)  मनुष्य को जहाँ से भी कोई अच्छी बात मिले सीखने का यत्न करना चाहिए, यदि दुष्ट और बुरे व्यक्ति में भी कोई खास बात या गुण है तो उसे भी सीखने का यत्न करना चाहिए।
6)  यदि किसी कार्य के सम्बन्ध में कोई योजना बनाई है तो उसे कार्यरूप में परिवर्तीत होने तक गुप्त मंत्र की तरह सुरक्षित रखना चाहिए       अर्थात् किसी को भी बताना नहीं चाहिए।
7)  सफल होने के लिए अच्छे मित्रों की आवश्यकता होती है, लेकिन सर्वोच्य सफलता प्राप्त करने के लिए अच्छे शत्रुओं की जरूरत पड़ती हैं।
8)  जो मनुष्य धन आदि के लेन-देन में, विद्या या कोई हुनर सीखने में, खाने-पीने और हिसाब-किताब में कोई संकोच नहीं करते वे हमेशा      सुखी रहते है।

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