सिख धर्म और उनके दस गुरू कौन है,जानें

सिख धर्म की स्थापना लगभग 540 वर्ष पूर्व, गुरू नानक देव जी द्वारा की गई।

सिख धर्म के दस गुरू के नाम-

1) श्री गुरूनानक जी 2) श्री गुरू अंगद देव जी 3) श्री गुरू अमर दास जी 4) श्री गुरू रामदास जी 5) श्री गुरू अर्जून देव जी 6) श्री गुरू हर गोबिन्द सिंह जी 7) श्री गुरू हर राय जी 8) श्री गुरू हरकिशन साहिब जी 9) श्री गुरू तेग बहादुर सिंह जी 10) श्री गुरूगोबिन्द सिंह जी ।

1) श्री गुरूनानक जी – सिख धर्म के प्रथम गुरू श्री गुरू नानकजी का जन्म 15 अपै्रल,1469 में ‘तलवंडी’ नामक स्थान पर हुआ। गुरू नानक जी के पिता श्री का नाम कल्याण चंद या मेहता कालू जी और माता जी का नाम तृप्ता था। नानक जी के जन्म के बाद तलवंडी का नाम ननकाना पड़ा। वर्तमान में यह जगह पाकिस्तान में है। उनका विवाह नानक सुलक्खनी के साथ हुआ था। इनके दो पुत्र श्रीचन्द और लक्ष्मीचन्द था। उन्होंने कर्तारपुर नामक एक नगर बसाया, जो अब पाकिस्तान में है। उस समय इंसान पुर्ण रूप से कुरीतियों,वहमों व अंधविश्वास से ग्रसित था। गुरू नानक जी ने इन बातों का विरोध किया व तीन नियमों को जीवन में ढालने पर जोर दिया-                           क)नाम जपना- ईश्वर का सिमरन करना  ब) किरत करनी- जीवन का निर्वाह मेहनत व ईमानदारी से करना  ब) वंड छकना- मिल बांट कर खाना। इसी स्थान पर सन् 1539 को गुरू नानक जी का देहांत हुआ था।

2) श्री गुरू अंगद देव जी- सिख के दूसरे गुरू, गुरू अंगद देव जी हुए। गुरू नानक देव ने अपने दोनों पुत्रों को छोड़कर उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाया था। उनका उनका जन्म फिरोजपुर, पंजाब में 31मार्च, 1504 को हुआ था। उनके पिता का नाम फेरू जी था, जो पेशे से व्यापारी थे। उनकी माता का नाम रामो जी था।

3) श्री गुरू अमर दास जी- गुरू अमर दास जी सिख धर्म के तीसरे गुरू हुए। उन्होंने जाति प्रथा, ऊंच नीच, कन्या हत्या जैसी कुरीतियों को समाप्त करने में अहम योगदान कियां। उनका जन्म 23मई, 1479 को अमृतसर के एक गांव में हुआ। उनके पिता का नाम तेजभान एवं माता का नाम लखमी था। उन्होंने 61 साल की उम्र में गुरू अंगद देव जी को अपना गुरू बनाया और लगातार 11 वर्षो तक उनकी सेवा की। उनकी सेवा देखते हुए गुरू अंगद देव जी ने गद्दी उन्हें सौंप दी। गुरू अमर दास जी का 1 सितंबर, 1574 में निधन हो गया।

4) श्री गुरू रामदास जी- गुरू रामदास जी सिख धर्म के चौथे गुरू हुए। इन्होंने गुरू पद 1574 ई0 में प्राप्त किया था। इस पद पर वे 1581 तक बने रहे। ये गुरू अमर दास के दामाद थे। इनका जन्म लाहौर में हुआ था। उनके माता-पिता उन्हें बाल्यावस्था में ही छोड़ कर चल बसे थे। वे नानी के साथ रहा करते थे। गुरू रामदास जी ने 1577 ई0 में ‘अमृत सरोवर नामक एक नगर की स्थापना की थी। जो आगे चलकर अमृत सर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

5) श्री गुरू अर्जुन देव जी- गुरू अर्जुन देव जी पांचवें गुरू हुए। उनका जन्म 15 अपै्रल, 1563 में हुआ था। ये 1581 ई0 में गद्दी पर बैठे। उन्होंने ‘हरमंदिर साहब’ (स्वर्ण मंदिर) का निर्माण कराया। उनका मृत्यु 30 मई 1606 को हुई थी।

6) श्री गुरू हर गोबिन्द सिंह जी- हर गोबिन्द सिंह जी छठे गुरू बने। गुरू हर गोबिन्द सिंह जी ही सिखों को अस्त्र-शस्त्र का प्रशिक्षण लेने के लिए प्रेरित किया व सिख पंथ को योद्धा चरित्र प्रदान किया। उन्होंने एक छोटी-सी सेना इकट्ठी कर ली थी। इससे नाराज होकर जहांगीर ने उनको 12 साल तक कैद में रखा। रिहा होने के बाद उन्होंने शाहजंहा के खिलाफ बगावत कर दी और 1628 ई0 में अमृतसर के निकट संग्राम में शाही फौज का हरा दिया। सन् 1644 ई0 को उनकी मृत्यु हो गई।

7) श्री गुरू हर राय जी- गुरू हर राय जी सिख के सांतवें गुरू बनें। उनका जन्म 16 जनवरी, 1630 ई0 में पंजाब में हुआ। इनका विवाह किशन कौर जी के साथ हुआ था। उनकें दो पुत्र गुरू रामराय जी और हरकिशन साहिब जी थे। इनकी मृत्यु सन् 1661 ई0 में हुई थी।

8) श्री गुरू हरकिशन साहिब जी- गुरू हरकिशन साहिब जी आंठवें गुरू बनें। उनका जन्म 7 जुलाई, 1656 को किरतपुर साहेब में हुआ था। उन्हें बहुत छोटी उम्र में ही गद्दी प्राप्त हुई थीं। 30 मार्च सन् 1664 को मृत्यु हो गई।

9) श्री गुरू तेग बहादुर सिंह जी- गुरू तेग बहादुर सिंह का जन्म 18 अप्रैल, 1621 को पंजाब में हुआ था। ये सिख धर्म के नौवें गुरू बने थे। उस समय हिन्दुस्तान पर मुगलों का राज था। वक्त के साथ मुगल शासक इतने क्रूर हो गए कि उन्होंने हिन्दुओं पर जुल्म करने शुरू कर दिये। औरंगजेब के शासन में हिन्दुओं के धार्मिक चिन्हों (जनेऊ, चोटी इत्यादि) को काटकर अपमानित किया जाने लगा। उसका हुक्म था कि हिन्दुओं को जबरदस्ती मुस्लमान बना दिया जाए। सब तरफ .त्राहि-त्राहि मची हुई थी और लोगों का मनोबल समाप्त हो चुका था। इस जुल्म से मुक्ति देने तथा हिन्दुओं का खोया हुआ सम्मान वापिस दिलाने के लिए सिक्खों के नौवें गुरू ‘‘तेग बहादुर जी’’ ने चाँदनी चौक (दिल्ली) में अपनी शहीदी दी। इनका मृत्यु 24 नवंबर, 1675 को हो गया।

10) श्री गुरूगोबिन्द सिंह जी- श्री गुरूगोबिन्द सिंह जी सिख धर्म के दसवें और अंतिम गुरू माने जाते हैं। उनका जन्म 22 दिसंबर, 1666 ई0 को पटना में हुआ था। उन्हें 9 वर्ष में ही गुरू गद्दी मिल गई थी। वे तेग बहादुर जी के पुत्र थे। गुरू ‘गोविन्द सिंघ जी’ ने भक्ति व शक्ति का मेल करते हुए सन् 1699 में ‘खालसा‘ की सृजना की और सहमे, हताश तथा मुर्दा हो चुके समाज में नई उमंग भर दी। उनकी मृत्यु 7 अक्टूबर 1708 ई0 हुई। उन्होंने खालसा को पूरे केश तथा पगड़ी के साथ एक अलग पहचान दी ताकि कोई भी व्यक्ति सहायता के लिए, खालसा को दूर से पहचान कर उससे मदद मांग सके और फरमान किया-

चिड़ियों से मैं बाज लड़ाऊँ, गिदड़ों को मैं शेर बनाऊँ।
सवा लाख से एक लड़ाऊँ, तबै गोविन्द सिंघ नाम कहाऊँ।।

तब बाद में गुरू गोबिन्द सिंह ने गुरू प्रथा समाप्त कर गुरू ग्रंथ साहिब को ही एकमात्र गुरू मान लिया।

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