सोलह सोमवार व्रत की विधि एवं नियम-solah somvar vart katha

सोमवार का व्रत चैत्र,वैशाख,सावन,मार्गशीर्ष, कार्त्तिक मास में प्रारम्भ किया जाता है। साधारणतः श्रावण मास में सोमवार व्रत का विशेष लाभ है, उसी दिन व्रत प्रारम्भ करना चाहिये। व्रत करने वाले भक्तगण को चाहिए कि प्रातःकाल काले तिल का तेल लगाकर स्नान करें। श्वेत वस्त्र पहनकर मृग चर्म कुश के आसन पर बैठें। सामने शंकर भगवान की मूर्ति तथा साथ में बने यंत्र को ताम्रपत्र पर खुदवाकर सामने रखें। चंदन,अक्षत, सफेद फूल, धूप, दीप, भांग तथा काली मिर्च आदि से पूजन करें। शिवजी का ध्यान करते हुए निम्नांकित मंत्र पढ़कर समर्पण करें-

कर्पूर गौरं करूणावतारं, संसार सारं, भुजगेन्द्र हारम्।
सदा बसन्तं हृदयारविन्दे, भवं भवानी सहितं नमामि।।

इसके बाद कथा का पाठ करें। पाठ के अंत में रूद्राक्ष की माला से ‘‘ऊँ नमः शिवाय’’ का 108 बार जप करें। अंत में शंकर भगवान का आरती उतारें। इस प्रकार शिव-पार्वती की पूजा करनी चाहिए।

अथ उद्यापन विधि-

सोलह सोमवारों के व्रत करने के बाद व्रत का उद्यापन करना चाहिए। उद्यापन करने से व्रत की पूर्णता होती है। शक्ति और सामर्थ के अनुसार स्वर्ण,रजत,ताम्र की शिव-पार्वती की मूर्ति बनावें और जल से भरा हुआ कलश स्थापित करें। चंदन,अक्षत,पुष्प, यज्ञोपवीत,धूप-दीप,नैवेद्य एवं विविध प्रकार की सामग्रियों से शिव-पार्वती की पूजा करें। पूजन के पश्चात् हवन करें। अंत में ब्राह्मणों को भोजन करावें। यथा शक्ति दान दें तथा यह मंत्र कहें-

धेनर्वै जगता माता, नित्य विष्णु पदे स्थिता।
सत्वासत्वमया दत्ता, प्रीयतां में सदाशिव।।

अथ सोलह सोमवार व्रत की कथा भाषा-

एक समय श्री महादेवजी पार्वतीजी के साथ भ्रमण करते हुए मृत्युलोक में अमरावती नगरी आए, वहाँ राजा ने सुंदर शिवजी का मंदिर बनवाया। शंकरजी वहीं ठहरने लगे। एक दिन पार्वतीजी शिव से बोली-नाथ! आओ चौसर खेलें। खेल प्रारंभ हुआ, उसी समय पुजारी जी पुजा करने आए। पार्वती ने पूछा- पुजारी जी! बताइये जीत किसकी होगी? वह बोले- शंकरजी की, और अंत में जीत पार्वती की हुई। पार्वती ने मिथ्या भाषण के कारण पुजारी को कोढ़ी होने को श्राप दिया, पुजारी जी कोढ़ी हो गए। कुछ साल बाद अप्सराएँ पुजन के लिए आयीं, पुजारी जी से कोढ़ी होने का कारण पूछा, पुजारी जी ने सब बात बता दिया। अप्सराएँ बोली- पुजारी जी तुम सोलह सोमवार का व्रत करो, महादेवजी तुम्हारा कष्ट दूर करेंगे। पुजारी जी ने उत्सुक्ता से व्रत की विधि पूछी। अप्सरा बोली-सोमवार को व्रत करें, संध्योपासनोपरान्त आधा सेर गेहूँ के आटे से तीन अंगा बनावें और घी गुड़, दीप, नैवेद्य, बेलपत्र आदि से पूजन करें। बाद में एक अंगा अर्पण कर, शेष दो अंगा प्रसादी समझ वितरित कर स्वयं प्रसाद लें। इस विधि से सोलह सोमवार कर सत्रहवें सोमवार को पाव से गेहूँ के आटे की बाटी का चूरमा बनाकर भोग लगाकर बाँट दें। फिर कुटुम्ब प्रसाद ग्रहण करें। ऐसा करने से शिवजी तुम्हारे मनोरथ को पूर्ण करेंगे, यह कह कर अप्सराएँ स्वर्ग को चली गयीं। पुजारी जी यथाविधि व्रत कर रोग मुक्त हुए और पूजन करने लगे। कुछ दिन बाद शंकर-पार्वती पुनः आए। पुजारी को कुशलतापूर्वक देख पार्वतीजी ने रोग मुक्ति का कारण पूछा। पुजारी के कथानुसार पार्वती ने भी व्रत किया। फलस्वरूप अप्रसन्न कार्तिकेयजी माता के आज्ञाकारी हुए। कार्तिकेयजी ने भी पार्वती से पूछा कि क्या कारण है कि मेरा मन आपके चरणों में लगा? पार्वती ने यहि व्रत बतलाया कार्तिकेयजी ने भी व्रत किया। फलस्वरूप बिछड़ा हुआ मित्र मिला। उसने भी कारण पूछा। बताने पर विवाह की इच्छा से यथाविधि व्रत किया। फलतः वह विदेश गया। वहाँ राजी की कन्या का स्वर्यवर था। राजा का प्रण था कि हथिनी जिसको माला पहनायेगी उसी के साथ पुत्री का विवाह होगा। यह ब्राह्मण भी स्वयंवर देखने की इच्छा से एक ओर जा बैठा। हथिनी ने माला इसी पंडित को पहनाई। धूमधाम से विवाह हुआ। तत्पश्चात् दोनों सुख से रहने लगे। एक दिन राजकन्या ने पूछा-नाथ! आपने कौन सा पुण्य किया जिससे राजकुमारों को छोड़ हथिनी ने आपका वरण किया? ब्राह्मण ने सोलह सोमवार का व्रत सविधि बताया। राजकन्या ने सत्पुत्र-प्राप्ति के लिये व्रत किया और सर्वगुण-सम्पन्न पुत्र प्राप्त किया और बड़ा होने पर पुत्र ने पूछा-माताजी! किस पुण्य से मेरी प्राप्ति आपको हुई। राजकन्या ने सविधि सोलह सोमवार व्रत बतलाया। पुत्र राज्य की कामना से व्रत करने लगा। उसी समय राजा के दूतों ने आकर उसको राजकन्या के लिये वरण किया। आनंद से विवाह समन्न हुआ। राजा देवलोक होने पर ब्राह्मण कुमार को गद्दी मिली। फिर भी, वह इस व्रत को करता रहा। एक दिन उसने अपने पत्नी से पूजन-सामग्री शिवालय में ले चलने को कहा, परन्तु उसने पूजन-सामग्री दासियों के द्वारा भिजवा दी।

जब राजा ने पूजन समाप्त किया, तो आकाशवाणी हुई कि इस पत्नी को निकाल दे, नही तो यह तेरा सत्यानाश कर देगी। प्रभु की आज्ञा मान उसने रानी को निकाल दिया। रानी भाग्य को कोसती हुई एक नगर में एक बुढ़िया के पास गई। दिन देखकर बुढ़िया इसके सिर पर सूत की पोटली रख बाजार में भेजी। रास्ते में आँधी आयी, पोटली उड़ गई, बुढ़िया ने इसको फटकार कर भगाया। वहाँ से तेली के पास पहुँची, तो सब माँट चटक गये, उसने भी निकाल दिया। पानी पीने नदी पर पहुँची तो नदी सुख गई। सरोवर में पहुँची, तो हाथ स्पर्श होते ही जल में कीड़ी पड़ गये। उसी जल को पी आराम करने के लिये जिस पेड़ के नीचे जाती वही सुख जाता। वन और सरोवर की दशा देखकर ग्वाले इसे मंदिर के गुसाई के पास ले गये। यह देखकर गुसाई जी समझ गये कि यह कुलीन अबला आपत्ति की मारी हुई है। धैर्य बँधाते हुए बोले- बेटी! तू मेरे यहाँ रह, किसी बात की चिंता मत कर। रानी आश्रम में रहने लगी, परन्तु जिस वस्तु से उसका हाथ लगे उसी में कीड़े पड़ जायें। दुःखी हो गुसाई जी ने पूछा-बेटी! किस देव की आराधना से तेरी यह दशा हुई है? रानी ने बताया- मैं पति की आज्ञा का उल्लंघन कर महादेवजी के पूजन को नहीं गयी। गुसाई जी ने शिवजी से प्रार्थना की। गुसाई जी बोले-बेटी! तुम सोलह सोमवार का व्रत करो। रानी ने सविधि व्रत पूर्ण किया। व्रत के प्रभाव से राजा को रानी याद आयी और दूतों को उसकी खोज करने के लिये भेजा। आश्रम में रानी को देख दूतों ने आकर राजा को रानी का पता बताया। राजा ने जाकर गुसाई जी से कहा-महाराज! यह मेरी धर्म पत्नी है, शिवजी के रूष्ट होने से मैंने इसका परित्याग किया, अब से शिवजी की कृपा से इसे लेने आया हूँ। कृप्या इसे जाने की आज्ञा दें। गुसाई जी ने आज्ञा दे दी। राजा-रानी नगर में आये। नगरवासियों ने नगर सजाया,बाजे बजने लगे, मंगलोच्चार हुआ, शिवजी की कृपा से प्रतिवर्ष सोलह सोमवार व्रत को कर रानी के साथ आनंद के साथ रहने लगे। अंत में शिवलोक को प्राप्त हुये। इसी प्रकार जो मनुष्य भक्ति सहित और विधि पूर्वक सोलह सोमवार का व्रत करता है और कथा सुनता है उसी सब मनोकामनायें पूर्ण होती है। अंत में शिवलोक को प्राप्त होता है।

अथ सोमवार व्रत कथा –

एक साहूकार बहुत ही धनवान था। उसको धन आदि में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं थी, परन्तु पुत्र न होने के कारण वह अतयन्त दुखी था। वह इसी चिन्ता में रात दिन रहता था और इसीलिए वह पुत्र कामना के लिए प्रति सोमवार को शिवजी का व्रत और पूजन किया करता था। सायंकाल को शिवजी के मंदिर में जाकर दीपक जलाया करता था। उसके इस भक्ति भाव को देखकर एक समय श्री पार्वती जी ने शिवजी महाराज से कहा कि हे महाराज! यह साहूकार आपका अन्नय भक्त है और सदैव आपका व्रत और पूजन बड़ी श्रद्धा से करता है, अतः इसकी मनोकामना पूर्ण करनी चाहिए। शिवजी ने कहा कि हे पार्वती जी! यह संसार कर्मक्षेत्र है। जैसे किसान खेत में जैसा बीज बोता है वैसा ही फल काटता है। उसी तरह इस संसार में जो जैसे कर्म करते हैं वैसा ही फल भोगते हैं। पार्वती जी ने अत्यन्त आग्रह से कहा कि महाराज ! जब यह आपका ऐसा भक्त है और यदि इसको किसी प्रकार का कोई दुख है , तो उसको अवश्य दूर करना चाहिए क्योंकि आप तो सदैव अपने भक्तों पर दयालु है, उनके दुःखों को दूर करते हैं। यदि आप एैसा नहीं करेंगे, तो मनुष्य क्यों आपकी सेवा, व्रत, पूजन करेंगे। पार्वती जी का ऐसा आग्रह देख शिवजी महाराज प्रसन्न हो कहने लगे- हे पार्वती! ठसको कोई पुत्र नहीं है, इसी पुत्रचिन्ता से यह अति दुःखी रहता हैं। इसके भाग्य में पुत्र न होने पर भी मैं इसको पुत्र की प्राप्ति का वर देता हूँ, परन्तु वह केवल 12 वर्ष तक ही जीवित रहेगा। इसके पश्चात् वह मृत्यु को प्राप्त होगा। इससे अधिक और मैं कुछ इसके लिए नहीं कर सकता। यह सब बात साहूकार सुन रहा था। इससे उसको न कुछ प्रसन्नता हुई और न दुःख हुआ। वह पूर्ववत् वैसे ही शिवजी महाराज का सोमवार का व्रत और पूजन करता रहा। कुछ काल व्यतीत हो जाने पर साहूकार की स्त्री गर्भवती हुई और दसवें महीने उसके गर्भ से अति सुन्दर पुत्र की प्राप्ति हुई। साहूकार के घर में बहुत खुशी मनाई गई, परन्तु साहूकार ने उसकी केवल 12 वर्ष की आयु जान कोई अधिक प्रसन्नता प्रकट नहीं की और न किसी को भेद बताया। जब वह 11वर्ष का हो गया तो उस बालक की माता ने उसके पिता से उसके विवाह आदि कि लिए कहा, परन्तु वह साहूकार कहने लगा- मैं अभी इसका विवाह नहीं करूँगा, काशीजी पढ़ने के लिए भेजूँगा। फिर उस साहूकार ने अपने साले अर्थात् बालक के मामा को बुला उसको बहुत-सा धन देकर कहा- तुम इस बालक को काशी जी पढ़ने के लिए ले जाओ और रास्त में जिस जगह भी जाओ वहाँ यज्ञ करते, दान देते तथा ब्राह्मणों को भोजन कराते जाओ। इस प्रकार वाह दोनों मामा-भानजे सब जगह यज्ञ करते और ब्राह्मणों को भोजन कराते जा रहे थे। रास्ते में उनको एक शहर पड़ा। उस शहर के राजा की कन्या का विवाह था और दूसरे राजा का लड़का जो विवाह के लिये बरात लेकर आया था। वह आँख का काना था। लड़की के पिता को इस बात की बड़ी चिंता थी कि वह वर को देखकर कन्या के माता-पिता विवाह में किसी प्रकार की अड़चन न पैदा कर दे। इस कारण जब उसने अतिसुन्दर सेठ के लड़के को देखा तो मन में विचार किया कि क्यों न दरवाजे के समय पर इस लड़के से वर का काम लिया जाय। ऐसा विचार कर राजा ने उस लड़के और मामा से कहा तो वह राजी हो गये और साहूकार के लड़के को स्नान आदि करा, वर के कपड़े पहना तथा घोड़े पर चढ़ा दरवाजे पर ले गये और बड़ी शांति से सब कार्य हो गया। अब वर के पिता ने सोचा यदि विवाह कार्य भी इसी लड़के से करा दिया जाय, तो क्या बुराई है, ऐसा विचार कर उसके मामा से कहा-यदि आप फेरों और कन्यादान का काम कर दे तो बड़ी कृपा होगी और हम इसके बदले बहुत कुछ धन देंगे। उन्होंने भी स्वीकार कर लिया और विवाह कार्य बहुत अच्छी तरह से हो गया, परन्तु जिस समय लड़का जाने लगा, तो राजकुमारी के चुनरी के पल्ले पर लिख दिया कि तेरा विवाह तो मेरा साथ हुआ, परन्तु जिस राजकुमार जिस राजकुमार के साथ तुमको भेजेंगे वह एक आँख का काना है और मैं तो काशी जी पढ़ने जा रहा हूँ। उस राजकुमारी ने जब अपनी चुनरी पर ऐसा लिखा पाया तो उसने राजकुमार के साथ जाने से इनकार कर दिया और कहा कि यह मेरा पति नहीं है। मेरा विवाह इसके साथ नहीं हुआ। वह तो काशी जी पढ़ने गया है। राजकुमारी के माता-पिता ने अपनी कन्या को विदा नहीं किया और बारात वापस चली गयी। उधर से सेठ का लड़का और उसका मामा काशी पहुँच गये। वहाँ जाकर उन्होंने यज्ञ करना और लड़के ने पढ़ना शुरू कर दिया।

जब लड़के की आयु बारह साल हो गयी तब एक दिन उन्होंने यज्ञ रचा रखा था कि उस लड़के ने अपने मामा से कहा- मामा जी! आज मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है। मामा ने कहा अंदर जाकर सो जाओ। लड़का अंदर जाकर सो गया और थोड़ी देर में उसके प्राण निकल गये। जब मामा ने आकर देखा कि वह तो मुर्दा पड़ा है तो उसको बड़ा दुःख हुआ और उसने सोचा कि मैं अभी रोना-पिटना मचा दूँगा तो यज्ञ का कार्य अधूरा रह जायेगा, अतः उसने जल्दी से यज्ञ का कार्य पूरा समाप्त कर ब्राह्मणों के घर जाने के पश्चात् रोना पिटना आरंभ कर दिया। संयोगवश उस समय शिवजी महाराज और पार्वतीजी उधर से जा रहे थे। जब उन्होंने जोर-जोर से रोने-पिटने की आवाज सुनी तो पार्वतीजी शिवजी से आग्रह करके उसके पास ले गयी और सुंदर लड़के को मरा देखकर कहने लगी महाराज! यह तो उसी सेठ का लड़का है जो आपके वरदान से हुआ था। शिवजी ने कहा कि पार्वती इसकी आयु इतनी ही थी जो भोग चुका। पार्वतीजी ने कहा कि महाराज कृपा करके बालक को और आयु दो नही तो इसके माता-पिता तड़प-तड़प कर मर जायेंगे। पार्वतीजी के इस प्रकार बार-बार आग्रह कहने पर शिवजी ने उसको वरदान दिया और शिव महराज की कृपा से लड़का जिवित हो गया। शिवजी-पार्वतीजी कैलाश चले गये तब लड़का और उसका मामा इसी प्रकार यज्ञ करते हुये अपने घर की तरफ चल पड़े और उस रास्ते से उसी शहर में आये, कि जहाँ पर लड़के का विवाह हुआ था। वहाँ आकर जब उन्होंने यज्ञ आरंभ कर दिया तो उस लड़के के श्वसुर ने उसको पहचान लिया और अपने महल में लाकर उसकी बड़ी खातिर की। साथ ही, बहुत सारा धन और दासियों सहित बड़े आदर और सत्कार के साथ अपनी लड़की और जमाई को विदा किया। जब वह अपने शहर के निकट आये, तो उसके मामा ने कहा कि पहले मैं तुम्हारे घर जाकर खबर कर आता हूँ। उस समय माता-पिता छत पर बैठे हुये थे और उन्होंने यह प्रण कर रखा था कि यदि हमारा पुत्र सकुशल घर आया तो राजी-खुशी घर आ जायेंगे, नही तो छत से गिरकर अपने प्राण दे देंगे। इतने में उस लड़के के मामा ने यह सारा सामाचार दिया कि आप का पुत्र आ गया है, परंतु उनको विश्वास न आया तब उसके मामा ने सपथ पूर्वक कहा कि आप का पुत्र अपनी स्त्री तथा बहुत सारा धन लेकर आया है, तो उस सेठ ने बडे़ आनंद के साथ उनका स्वागत् किया और वह बहुत प्रसन्नता के साथ रहने लगा। इसी प्रकार जो कोई भी सोमवार का व्रत धारण करता है अथवा इस कथा को सुनाता है उसके दुःख दूर होकर उसकी समस्त मनोकामनायें पूर्ण होती है। इस लोक में नाना प्रकार के सुख भोग कर अंत में सदा शिव के लोक की प्राप्ति होती है।

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