स्वास्थ्य ही धन है

स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है-

जिसका शरीर और मन अपने काम को उत्सुकता और फूर्ति से करने के बाद भी थके या हारे नहीं, बल्कि उसमें इसके बाद भी इतनी शक्ति बची रहे कि वह स्वयं प्रसन्न हो और प्रसन्नतापूर्वक दूसरे असमर्थो की सहायता कर सके, उनके काम निपटाने में हाथ बँटा सके- उसे ही हम कहगें ‘स्वस्थ’ और उसके इस सामर्थ्य को कहा जायेगा ‘स्वास्थ्य’।

भरे बोरे की तरह मोटा हो जाना अच्छे स्वास्थ्य की निशानी नहीं है, न ऐसी दुर्बलता ही, जिसे पछुआ हवा का एक झोंका पीपल के सूखे पत्ते की तरह उड़ाकर कहीं ले जाए। एक कोस चले तो हाफने लगे, घंटेभर पढ़े, तो सिर चक्कर खा जाए, अपना मामूली सामान दस कदम ढोने में कुली के बिना काम न चले- उसे हम स्वस्थ कदापि न कहेंगे।

स्वास्थ्य मनुष्य की प्रथम संपत्ति है, यह ईश्वर का दिया हुआ सभी वरदानों में सर्वोत्तम वरदान है। ऐसा स्वास्थ्य अमीरों के लिए वरदान है, गरीबों के लिए संपत्ति। एैसा स्वास्थ्य को किसी भी महँगे मूल्य पर खरीदा नहीं जा सकता। इसके बिना संसार का भोग संभव नहीं है। स्वस्थ व्यक्ति की भुजाएँ वटवृक्ष की तरह बेसहारा-निर्धन व्यक्तियों के लिए छाया का काम करती है।

अतः यदि हम पृथ्वी का सारा सुख भोगना चाहते हैं, तो हम राष्ट्र और विश्व की उन्नति करना चाहते हैं, यदि हम धर्मपालन करना चाहते हैं, तो स्वास्थ्य-रक्षा के नियमों का पालन करें। महर्षि चरक ने लिखा है- स्वास्थ्य-रूपी घर को ठीक रखने के तीन पाए हैं- उचित आहार, पूर्ण निद्रा और ब्रह्यचर्य। विद्वानों का यह उक्ति विख्यात है कि सवेरे सोना और सवेरे जागना मनुष्य को स्वस्थ, संपन्न एवं बुद्धिमान बनाता है।
शरीर को स्वस्थ रखने के लिए किसी भी चीज का अति नहीं करना चाहिए- अतिभोजन, अतिजागरण, अतिशयन, अतिविलास, अतिश्रम इत्यादि। महात्मा गाँधी जी ने लिखे हैं- जो जीभ के स्वाद में पड़ा, उसका स्वास्थ्य अवश्य नष्ट हुआ। स्वास्थ्य परिश्रम में वास करता है और उस तक पहुँचने का, श्रम को छोड़कर अन्य कोई मार्ग नहीं।

अच्छा स्वास्थ्य सर्वोत्तम धन है। उसे किसी भी मूल्य पर खरीदा नहीं जा सकता। जीवन का स्वाद तभी मिलता है, जब मनुष्य स्वस्थ रहे। स्वस्थ के लिए यह पृथ्वी स्वर्ग है, अस्वस्थ के लिए नरक। स्वस्थ शरीर ही धर्म का साधन है, ‘‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’’- कविकुलगुरू कालिदास ने ठीक ही कहा है। स्वस्थ मानव ही सृष्टि का सर्वोत्तम श्रृगार है। अतः, जिस प्रकार हो, स्वस्थ रहने का पुर्ण प्रयत्न करनी चाहिए। हम भी अपने ऋषि के स्वर में स्वरा मिलाकर स्वीकार करें-‘धर्मार्थकाममोक्षाणमारोग्यं मूलमुत्तमम्’, अर्थात् धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारो पुरूषार्थों का उत्तम आधार सुन्दर स्वास्थ्य ही है।

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