हमारे अस्वस्थ शरीर का कारण, विदेशी भोजन की नकल एवं डिब्बा बंद खाना

भारतवासियों का यह दुर्भाग्य है कि जिस भारत देश में हजारों साल से सैंकड़ों किस्म के गेंहूँ के आटा से बनने वाले व्यजंन रहे हो,वो भारतवासी सवेरे से शाम तक पाव रोटी और डबल रोटी खाते हैं पिज्जा,बर्गर,हॉट-डॉग इन्हीं नामों के सब पाव रोटी और डबल-रोटी, पिज्जा कह लो या बर्गर कह लो उसको बीच से काट कर सलाद भर दो या सलाद के बीच में उसको लगा के खा लो, बात तो बराबर ही है तो आप देखों हम कितने नीचे आ गये हैं,कितना पतन हमारा हुआ सैंकड़ों किस्म के व्यंजन जो हम गेंहूँ के आटे से बना सकते हैं उस देश के लोग पॉव रोटी,डबल रोटी,पिज्जा खाने में फँस जाये तो यह भी हमारे सांस्कृति पतन की निशानी है यह बल्कि मूर्खता की निशानी है,मुर्खता इसमें क्या है आपको पता है कोई भी पाँव-रोटी,डबल-रोटी जो आप खाते है वो ताजा नहीं होती है ताजा होती तो वह बनती ही नहीं वो तो बासी होती है वो एक दिन बासी,दूसरे दिन दस दिन,पन्द्रह दिन हो सकती है, यूरोप और अमेरिका में तो एक से तीन महीना पुरानी बासी पाँव-रोटी मिलती है और लोग उन्हीं को खा कर गुजारा और पेट भरते हैं। अब हमलोग उनलोंगों की नकल करके हमारे घर में भी बासी डबल-रोटी लाना और खाना शुरू कर दिया,गेंहूँ के आटे के बारे में विज्ञान यह कहता है कि आटे को गीले होने के 48 मिनट के भीतर इसका रोटी बन जाना चाहिए और रोटी बनने के 48 मिनट में खा लेना चाहिए।

पाँव-रोटी और डबल-रोटी का कहानी अगर सुनना और गिनना शुरू करेगें तो वो तो 10-20 दिनों का पुराना होता है उसको खराब कर के खा रहे है और बड़ा शान में महशूस करते है अपने आप को स्मार्ट कहते है पाँव-रोटी,डबल-रोटी खाते है। स्मार्टनेस मानते है इनको खाकर,अब यह तय करने की जरूरत है कि यह मूर्खता की निशानी है या स्मार्टता की। पढ़े लिखे घर में खासकर अंग्रेजी वाले घरों में इस तहर के भोजन का इतना तेजी से प्रवेश हुआ है कि भारत के विविधता पूर्ण व्यजंन घर से गायब हो गया है। अगर आप ईमानदारी से एक काम करें – हम में से कोई भी यह काम करे, जिस दिन हमारा जन्म हुआ हो और जिस दिन हमारी मृत्यु हो, ये सारे दिन गिन लें, इतने दिन हम नये-नये व्यंजन बनाकर भारत में खा सकते हैं। इतनी विविधता इस भारत देश में हजारों वर्ष से उपलब्ध है। अब इस देश में गिने-चुने व्यंजन जो अंग्रेजी वाले है वे हमारे घरों में पहुँच गया है। व्यंजन में डबल-रोटी, पाँव-रोटी, बिस्किट, हॉट-डॉग इत्यादि। जिस देश में ताजी रोटी बनती हो, ज्वार की रोटी, बाजरे की रोटी, मक्के की रोटी या तीनों मिलाकर बनती हो उस देश के लोग बिस्किट,पॉव-भाजी,डबल-रोटी खाने लगे है। इससे ज्यादा शर्मनाक और कुछ क्या हो सकता है,भोजन स्तर पर इतनी ज्यादा गिरावट आ गई है। भारत जैसे इतने अद्भुत देश में रहते हैं जिसकी कल्पना किसी देश से नहीं की जा सकती है।

हम भारत में ऐसे स्थान में रहते है जहाँ हमको ताजा सब्जी सुबह-शाम उपलब्ध होती है- ताजा टमाटर,ताजा मटर,ताजा भिण्डी और भी अन्य सब्जी जो सुबह-शाम दोनों बिकती है। आपके घर तक कोई देकर जाता है वो है ठेले वाले। युरोप-अमेरिका में तो ताजा सब्जी उपलब्ध ही नहीं उनके नसीब में है ही नहीं, क्योंकि वहाँ होता ही नहीं वे बाहरी देश से खरीदते है। मुझे अफसोस होता है कि जिस भारत देश में सभी चीजे ताजी पायी जाती है,वहाँ के लोग टोमेटो सॉस खायें,जो दो-दो साल पुरानी है। जब टमाटर ताजी मिल रहीे हो उनकी चटनी सुबह-शाम खा सकते हैं। हम बाजार जायें और टोमेटो-चिल्ली सॉस ले कर आयें और अगर कोई पुछे कि यह क्या है तो हम जवाब देंते है कि Its different   वो  different   क्या है 3 महीनें पुराना सड़े-गले टमाटर का रस जो उस में है वो ही है different । ताजा टमाटर खरीदें वो 10-20रू किलो मिले और टोमेटो सॉस खरीदें, तो 150रू किलो मिले ये different है। टमाटर 10-20रू किलो मिल रहा हो उसकी चटनी बनाकर खायें कितना अच्छा लगे (मिठी चटनी,खट्टी चटनी,खट्टी-मिठी चटनी बन सकते है)
उसमें फ्रीजर-रेटर मिलाकर जो जहर कैंसर पैदा करते है तीन-तीन महीनें पुराने टोमेटो सॉस खायें ये  different हैं। इतना हमारे भोजन में परिवर्तन आया, ताजा टमाटर चटनी की जगह टोमेटो सॉस और ताजा गेंहूँ के आटा के जगह कई महीने पुराने डबल-रोटी,पाँव-रोटी,हॉट-डॉग आ चुका है। पहले हमारे घरों में रोज हमारी माता-बहनें चक्की चलाती थी,रोज ताजा आटा निकलता था। सुबह का पीसा हुआ आटा सुबह खत्म और शाम में शाम का आटा खत्म। इसी कारण हम भारतवासी बिमार नहीं हुआ करते थें। हमेशा स्वस्थ रहते थे दुसरों को भी स्वस्थ रखते थे।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *