होली क्या है और क्यों मनातें हैं ?

होली हिन्दुओं का धार्मिक पर्व है। होली हिन्दी माह के चैत्र के पहले दिन को मनाते हैं। इसके एक दिन पहले यानि फाल्गुन की पुर्णिमा को होलिका दहन के रूप में मनाते हैं। होलिका दहन को असत्य पर सत्य की विजय के रूप में भी मनाते हैं। हिन्दू धर्मग्रन्थ के अनुसार होलिका नाम की एक राक्षसी के मरनोपरान्त यह पर्व मनाया जाता है। इस पर्व में सभी लोग खुशी-खुशी रंग और गुलाल एक दूसरे को लगाते है एवम् पुए-पकवान तथा अनेकों तरह के मिष्ठान का भोग लगाते हैं। पुराणों में भी वर्णन है कि श्री कृष्ण भगवान के समय में भी वृन्दावन में पूरे रीति-रिवाज के अनूसार यह पर्व मनाया जाता था। वैसे तो यह पर्व भारत देश के सभी राज्यों में पूरे-धूम-धाम से मनाया जाता है, परन्तु वृंदावन में विशेष रूप में बिना भेद-भाव के मंदिरों में आकर लोग अबीर-गुलाल लगाते हैं और खुशीयॉं मनाते है।

होलिका और होलिका दहन का इतिहास क्या है?
प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक असुर राजा था। वह बहुत ही क्रूर एंव दुष्ट स्वभाव का था। हिरण्यकशिपु ने भगवान ब्रह्यदेव को प्रसन्न करके यह वरदान मांगा था कि संसार का कोई भी प्राणी अर्थात् जीव-जन्तु,देवी-देवता,राक्षस या मनुष्य,स्त्री या पुरूष मुझे मार न सके। न मैं दिन में मरूॅं-न मैं रात में, न घर के बाहर-न घर के अन्दर,न पृथ्वी पर न आकाश में,न अस्त्र से मरूॅ न शस्त्र से। भगवान ब्रह्यदेव से ऐसा वरदान पाकर वह और भी क्रूर और निरंकुश हो गया था। हिरण्यकशिपु स्वयं को ही भगवान समझने लगा अैर सभी पर अत्याचार करने लगा। वह भगवान विष्णु को ही अपना प्रबल शत्रु समझने लगा।

लेकिन कहा गया है कि अधर्म कितना ही बड़ा क्यों न हो, धर्म के सामने अर्धम को झुकना ही पड़ता है। विधाता ने हिरण्यकशिपु के घर में ही ,उसी के बेटे के रूप में धर्म का बीज बोया, जिसका नाम था प्रहलाद। हिरण्यकशिपु जितना ही अधार्मिक,क्रूर,अत्याचारी था और अपने सिवा किसी को भगवान नहीं मानता था उसी का उल्टा उसका पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु का परम भक्त,दयालु और धार्मिक था। हिरण्यकशिपु के राज्य में जो भी भगवान का पूजा करता उसे मार डालता और बोलता कि पूजा करना है तो मेरा करो,उस विष्णु का नहीं। परन्तु उसका पुत्र प्रहलाद उठता तो श्री हरि का ही नाम लेता और सभी को श्री हरि अर्थात् भगवान विष्णु का ही नाम लेने को कहता था।

जब हिरण्यकशिपु को यह पता चला कि उसका पुत्र ही विष्णु का भक्त निकला और लोगों को भी श्री हरि अर्थात् विष्णु का गुणगान करने को कहता है तो प्रहलाद को डांटा और दण्डित भी किया। प्रहलाद को पर्वत से फेंका गया एवम् प्रतारित किया गया, किन्तु यह उक्रि है कि “जाको राखे साइंया मार सके न कोई” प्रहलाद हर बार भगवान विष्णु को नाम लेता रहा और बचता रहा। हिरण्यकशिपु की एक बहन थी। नाम था होलिका। हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को जब पता चला कि उसका भाई हिरण्यकशिपु,प्रहलाद के कारण चिन्ता में है तो वह हिरण्यकशिपु से मिली और बोली कि उसके पास एक ऐसा वस्त्र(चादर)है जिसे ओढ़कर मैं प्रहलाद को लेकर अग्नि में बैठ बैठ जाऊँगीं। तब हिरण्यकशिपु ने आज्ञा दिया कि ढेर सारी लकड़ियों को इक्ठ्ठा किया जाय और उसमें होलिका और प्रहलाद को विठाकर आग लगा दिया जाय। ऐसा ही किया गया। परन्तु कहा गया है कि मारने वाला से बड़ा बचाने वाला होता हैं। भगवान विष्णु के कृपा से प्रहलाद इस बार भी बच गया और होलिका जल गई क्योंकि जो वस्त्र(चादर)ओढ़कर होलिका बैठी थी वह प्रहलाद के शरीर पर आ गया और चादर नहीं रहने से होलिका जल गई।

कुछ दिनों बाद हिरण्यकशिपु ने प्रहलाद को सभा में बुलाया और कहा कि तुम्हारे विष्णु कहाँ रहते हैं उसे बुलाओ! तब प्रहलाद बोला कि भगवान विष्णु तो सभी जगह और हर वस्तु में हैं। इस निर्जीव खम्भें में भी हैं। हिरण्यकशिपु जोर से हँसा और खम्भें पर अपने गदे से प्रहार किया और बोला कि अगर तुम्हारे विष्णु इस खम्भें मे है तो बुलाओ। परन्तु गदे के प्रहार से जो कुछ भी वहाँ हुआ वह आर्श्चय चकित करने वाला था। उस खंभे से डरावनी आवाजें आई और उस खंभे से न नर-नारी,न पशु-पक्षी,न देवी-देवता,न जन्तु और न ही राक्षस बल्कि डरावनी शरीर सा एक नरसिंह नाम से श्री हरि विष्णु प्रकट हुए, जिसके नख बड़े-बड़े,विशाल शरीर,गुस्से से आँख लाल थे, हिरण्यकशिपु कि ओर बढ़े और उठाकर दरवाजे के बीच लाये और बोले- देखो न दिन है न रात है,न घर के अन्दर है न घर के बाहर, न पशु हूँ न पक्षी, न स्त्री है न पुरूष , न देवता है न दानव, इतना कहकर उन्होंनें हिरण्यकशिपु को चौखट पर लाकर अपने जंघे पर लिटाकर अपने नख से ही हिरण्यकशिपु के छाती को फाड़कर उसका अन्त कर दिया और धर्म की रक्षा की।

सभी भगवान विष्णु की जयकार करने और प्रहलाद की गुणगान करने लगे एवम् सभी खुशी से झूमने लगे। उसी दिन से होली के एक दिन पहले होलिका के जलने के कारण अगजा और चैत्र प्रतिपदा को हाली मनाई जाती हैं। अगजा में लोग आलू,नीम की पत्ती,चने को पकाते है और खाते हैं जिससे सकारात्मक शक्तियाँ प्राप्त होती है तथा उसके बाद होली के दिन असत्य पर सत्य की विजय के रूप में पुआ-पूड़ी, पकौड़ी खाते है और रंग-गुलाल लगाकर खुशियाँ मनाते हैं।

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